भारत जल रहा है 2026 — Heat Dome, El Niño और वो सवाल जो कोई नहीं पूछता

Dhumal Aniket

Publisher - Forest Timbi Media

Heat wave in india 2026

भारत में गर्मी से हाहाकार मचा हुआ है। करोड़ों लोग इससे प्रभावित हैं।वो सवाल जो पूछे जाने चाहिए थे, पर कभी नहीं पूछे गए।28 अप्रैल 2026। दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से 97 भारत के थे।यह कोई इत्तेफाक नहीं। यह चेतावनी है। और हम अभी भी सो रहे हैं।अप्रैल 2026 के आखिरी हफ्ते में बांदा का तापमान 47.6°C पहुंच गया। दिल्ली में 44°C। राजस्थान, यूपी, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र — हर तरफ आग। महाराष्ट्र के अकोला और अमरावती में राजस्थान के जैसलमेर से भी ज़्यादा तापमान दर्ज किया गया। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज भर रहे हैं। दिहाड़ी मजदूर, डिलीवरी बॉय, किसान — ये लोग धूप में जी रहे हैं और मर रहे हैं।

लेकिन टीवी पर क्या चल रहा है? “खूब पानी पिएं।” “दोपहर में घर पर रहें।”बस इतना?

यह आर्टिकल उन सवालों के बारे में है जो हर नेता, हर पत्रकार, हर नागरिक को पूछने चाहिए — पर कोई नहीं पूछता। क्योंकि इन सवालों के जवाब असुविधाजनक हैं। क्योंकि इन जवाबों में हम खुद दोषी हैं। हमने जैसा अपना देश बनाया है, वह देश अब रहने लायक भी नहीं बचा।

जून की गर्मी अप्रैल में क्यों आ गई? क्या यह सिर्फ मौसम का बदलाव है या कुछ और?

पहले अप्रैल में लू नहीं चलती थी। मई के आखिर में, जून में आती थी गर्मी का असली कहर। लेकिन 2026 में जो तापमान पहले जून के मध्य में रहता था, वह अप्रैल में दिख रहा है।

यह सिर्फ “थोड़ी जल्दी गर्मी” नहीं है। यह Jet Stream का खिसकना है। यह वायुमंडल की संरचना का बदलना है। यह उस Climate Baseline का ऊपर उठना है जिस पर हमारी पूरी खेती, पूरी जीवनशैली, पूरी अर्थव्यवस्था टिकी है।

Jet Stream क्या है?

Jet Stream लगभग 8–12 किमी ऊँचाई पर पश्चिम से पूर्व की ओर बहुत तेज गति से बहती है और पूरे मौसम को चलाने वाली “हाईवे” की तरह काम करती है, यानी यह तय करती है कि ठंडी-गर्म हवा और बादल कहाँ जाएँगे

पिछले चार दशकों में भारत का औसत तापमान 0.5 से 0.9 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। यह सुनने में मामूली लगता है। पर यही “मामूली” बदलाव हर हीटवेव को अधिक तीव्र, अधिक लंबा और अधिक घातक बना रहा है।

Super El Niño क्या है और हमारी नीतियां अभी भी 1990 के हिसाब से क्यों बनी हैं?

विश्व मौसम संगठन (WMO) ने अप्रैल 2026 में चेतावनी दी — मई से जुलाई 2026 के बीच El Niño शुरू हो सकता है। NOAA और ECMWF के मुताबिक जून-अगस्त 2026 में El Niño बनने की 62% संभावना है, जो अगस्त-अक्टूबर तक 80% तक पहुंच सकती है।

कुछ वैज्ञानिक इसे Super El Niño या Godzilla El Niño कह रहे हैं। ब्रिटेन के मौसम विभाग के Adam Scaife का कहना है कि पिछले एक महीने में प्रशांत महासागर में तापमान में जितनी तेज़ वृद्धि हुई है, वह इस सदी में पहले कभी नहीं देखी गई।

पिछले Super El Niño 2015-16, 1997-98 और 1982-83 में आए थे। हर बार वैश्विक तापमान का रिकॉर्ड टूटा। हर बार भारत में मानसून प्रभावित हुआ। हर बार सूखा पड़ा। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि इस बार El Niño आता है तो भारत में बड़ा अकाल पड़ सकता है।

El Niño क्या है?

El Niño को पूरी स्पष्टता से समझें तो यह असल में प्रशांत महासागर के ऊपर चलने वाली हवाओं (trade winds), समुद्र के तापमान और बादलों की पूरी प्रणाली के बिगड़ने की प्रक्रिया है। सामान्य हालत में ये हवाएं पूर्व (अमेरिका) से पश्चिम (एशिया-ऑस्ट्रेलिया) की ओर लगातार बहती हैं और समुद्र के ऊपर के गर्म सतही पानी को धकेलकर पश्चिम की ओर जमा कर देती हैं, जिससे भारत-इंडोनेशिया क्षेत्र में ज़्यादा गर्म पानी, ज़्यादा भाप (नमी), ज़्यादा बादल और अच्छी बारिश बनती है।

Heat wave in india 2026

जबकि अमेरिका के पास नीचे से ठंडा पानी ऊपर आता रहता है (इसे upwelling कहते हैं) जिससे वहां मौसम तुलनात्मक रूप से सूखा रहता है। लेकिन जब El Niño शुरू होता है तो किसी कारण से ये हवाएं कमज़ोर पड़ जाती हैं या रुक-सी जाती हैं। अब क्योंकि धक्का देने वाली ताकत खत्म हो गई, तो जो गर्म पानी पहले पश्चिम में जमा था वह धीरे-धीरे वापस मध्य और पूर्वी प्रशांत (अमेरिका की ओर) फैल जाता है। इस बदलाव से सबसे बड़ा असर यह होता है कि जहां पहले बारिश बनती थी (एशिया/भारत) वहां अब कम नमी और कम बादल बनते हैं — इसलिए मानसून कमज़ोर हो जाता है। और जहां पहले ठंडा पानी था (अमेरिका के पास), वहां अब गर्म पानी पहुंचकर ज़्यादा भाप और ज़्यादा बादल बनाता है, जिससे वहां भारी बारिश होती है।

इसका मतलब El Niño केवल “पानी गर्म हो गया” नहीं है — बल्कि हवा की ताकत घटने से गर्म पानी का स्थान बदलना, ठंडे पानी का ऊपर आना रुकना और बादलों-बारिश के पूरे Global System का एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट हो जाना है। यही कारण है कि इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है।

लेकिन AVM GP Sharma (President — Meteorology & Climate Change) कहते हैं कि El Niño जैसी स्थिति आ तो सकती थी, लेकिन अभी रुक गई है — नहीं आएगी। जो स्थिति भारत में है वह Heat Dome की है।

Heat Dome क्या है और यह भारत के ऊपर बार-बार क्यों बन रहा है?

यह शब्द आपने शायद नहीं सुना होगा। पर यही 2026 की इस गर्मी का असली ज़िम्मेदार है।

Heat Dome को बहुत आसान तरीके से समझें तो — जैसे धरती के ऊपर एक “ढक्कन” लग गया हो। सूरज की गर्मी नीचे आती रहती है, लेकिन ऊपर जाने का रास्ता बंद हो जाता है। इसलिए गर्म हवा ऊपर उठकर ठंडी नहीं हो पाती और नीचे ही फंसकर तापमान लगातार बढ़ाती रहती है। इसमें जो हवा “फंसी” होती है वह ज़मीन से लेकर आसमान के एक बड़े हिस्से तक फैली होती है — आमतौर पर यह पूरा सिस्टम Troposphere के अंदर बनता है, जो धरती से लगभग 8 से 12 किलोमीटर ऊंचाई तक फैला होता है (भारत जैसे क्षेत्रों में करीब 10–12 किमी)। लेकिन सबसे ज़्यादा असर नीचे के 0 से 2–3 किलोमीटर के हिस्से में महसूस होता है — जहां हम रहते हैं।

नतीजा यह होता है कि हवा का चलना कम हो जाता है, बादल नहीं बनते, बारिश भी नहीं होती और हर दिन गर्मी बढ़ती जाती है। इसी फंसी हुई गर्मी की स्थिति को Heat Dome कहते हैं।अभी तक इस Heat Dome में भारत के पूर्वी इलाके — मेघालय, अरुणाचल प्रदेश — बचे हुए हैं। यहां 25 डिग्री से कम तापमान दर्ज हुआ है। और यह भी देखा जा सकता है कि यहां वनों की संख्या सबसे ज़्यादा है।

Heat Dome के बाद अक्सर बारिश क्यों आती है?

Heat Dome या लंबी heatwave के बाद मई के पहले हफ्ते में बारिश की संभावना इसलिए बनती है क्योंकि इतने दिनों तक लगातार तेज गर्मी ज़मीन और निचली हवा को बहुत ज़्यादा गर्म कर देती है, जिससे वहां low pressure बनने लगता है। जैसे ही यह “गर्मी का ढक्कन” कमज़ोर होता है या टूटता है, आसपास के समुद्रों (अरब सागर और बंगाल की खाड़ी) से नमी भरी ठंडी हवाएं तेज़ी से उस low pressure की ओर आने लगती हैं। ये नम हवाएं ऊपर उठती हैं और तेज़ी से ठंडी होकर बड़े-बड़े बादल (cumulonimbus) बनाती हैं, जिससे अचानक तेज़ बारिश, आंधी या तूफान शुरू हो जाता है। यानी पहले Heat Dome ने गर्मी जमा की, फिर वही गर्मी low pressure बनाती है, और उसके बाद नमी आकर बारिश करा देती है — इसीलिए heatwave के तुरंत बाद अक्सर बारिश देखने को मिलती है।

AC चलाकर गर्मी से बचते हो या गर्मी और बढ़ाते हो?

Urban Heat Island का वो सच जो कोई नहीं बताता।यह सवाल सुनने में अजीब लगता है। पर इसका जवाब बहुत ज़रूरी है।हर Air Conditioner कमरे के अंदर ठंडक करता है — और बाहर गर्म हवा फेंकता है। भारत के शहरों में लाखों-करोड़ों AC हैं। हर इमारत, हर गाड़ी, हर दुकान — सब बाहर गर्मी उगल रहे हैं। मतलब एक कमरे में ठंडी हवा छोड़ रहे हैं और कमरे की गर्म हवा बाहर।

इसके ऊपर शहरों की कंक्रीट की सड़कें, डामर, ऊंची-ऊंची इमारतें — ये दिन भर की गर्मी सोख लेती हैं और रात को वापस छोड़ती हैं। इससे शहर की रातें भी गर्म हो जाती हैं। हरियाली गायब। पेड़ कटे। ज़मीन पक्की।इसे कहते हैं Urban Heat Island Effect। दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु और तमाम छोटे-मोटे शहरों का तापमान आसपास के गांवों से 4 से 7 डिग्री ज़्यादा है।तो जो गरीब आदमी AC नहीं खरीद सकता — वह न केवल गर्मी में मर रहा है, बल्कि अमीरों के AC की वजह से और ज़्यादा गर्मी झेल रहा है। क्या यह न्याय है? बिल्कुल नहीं।हम जिस गरीब आदमी की बात कर रहे हैं — वह मज़दूर के रूप में, किसान के रूप में, महिलाओं के रूप में, तमाम छोटे-छोटे उद्योगों में काम करने वाले लोगों के रूप में आता है। और यह हिस्सा भारत की आबादी का लगभग 70 से 80% है।

गर्मी से मौतें होती हैं, लेकिन आंकड़े क्यों छुपाए जाते हैं?

2000-2019 के बीच किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि प्रतिवर्ष लगभग 4,89,000 मौतें गर्मी से संबंधित कारणों से होती हैं — जिनमें से 45% एशिया में और 36% यूरोप में। तीव्र लू की घटनाओं से मृत्यु दर बहुत अधिक हो सकती है; 2003 में जून-अगस्त की लू के परिणामस्वरूप यूरोप में 70,000 लोगों की मृत्यु हुई। अकेले यूरोप में 2022 की गर्मियों में अनुमानित 61,672 अतिरिक्त मौतें गर्मी से संबंधित कारणों से हुईं। 2010 में रूसी संघ में 44 दिनों की लू के दौरान 56,000 अतिरिक्त मौतें हुईं।

भारत में एक दिन की भीषण गर्मी के कारण राष्ट्रीय स्तर पर अनुमानित 3,400 अतिरिक्त मौतें होती हैं। गर्मी के दिनों में 1,50,000 मौतें दर्ज की गई हैं। लेकिन यह आंकड़ा वास्तविक स्थिति से बहुत कम है।भारत में Heat Wave से होने वाली मौतों को Natural Disaster में नहीं गिना जाता। और इसे Natural Disaster में गिनने की कोई मंशा नहीं है — ऐसा सरकार ने संसद में कहा है। यदि गर्मी से होने वाली मौतों को Natural Disaster में लाया जाता है, तो सरकार को मृतकों के परिवारों को आर्थिक मदद देनी होगी। जो सरकार नहीं चाहती — क्योंकि आंकड़े इतने ज़्यादा हैं कि उनसे पार पाना मुश्किल होगा।

भारत में इन मौतों को गिनना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि गर्मी से होने वाली मौतें सीधे-सीधे दिखती नहीं हैं — जैसे कि किसी भूकंप, बाढ़ या कोरोना जैसी महामारी में होती हुई मौतें हमें साफ़ तौर पर दिख जाती हैं।हर साल गर्मी से सैकड़ों लोग मरते हैं। पर यह खबर दो दिन से ज़्यादा नहीं चलती। कोई राष्ट्रीय शोक नहीं। कोई संसद में बहस नहीं।क्यों? क्योंकि Heat Stroke को सरकारी रिकॉर्ड में “Natural Death” दर्ज किया जाता है। इसे “Disaster” नहीं माना जाता। इसलिए मुआवज़ा नहीं मिलता। इसलिए ज़िम्मेदारी नहीं तय होती।निर्माण मज़दूर, दिहाड़ी मज़दूर, डिलीवरी करने वाले लोग — ये वो लोग हैं जो 45 डिग्री में भी काम बंद नहीं कर सकते। क्योंकि काम बंद करने का मतलब है — खाना नहीं।देश की 52% कृषि भूमि पर और खुले में काम करने वाले करोड़ों लोग इस गर्मी की सबसे बड़ी मार झेलते हैं।जब बाढ़ आती है तो NDRF तैनात होती है। जब भूकंप आता है तो राहत टीम जाती है। तो जब 45 डिग्री में लोग मर रहे हों — “Heat Emergency” क्यों नहीं घोषित होती?

मौतों के पीछे गर्मी मुख्य कारण कैसे होती हैं?

बढ़ती गर्मी केवल असहजता नहीं है। यह पूरे शरीर के सिस्टम को प्रभावित करती है। इसका असर धीरे-धीरे हर अंग पर दिखता है। खासतौर पर मस्तिष्क पर — जहां सिरदर्द, चक्कर आना, चिड़चिड़ापन, समन्वय की कमी, भ्रम और मानसिक अस्थिरता जैसी समस्याएं आती हैं। बड़े खतरों की बात करें तो Stroke और Coma जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है। प्यास और मुंह सूखना इसके शुरुआती लक्षण हो सकते हैं।

गर्मी में दिल पर दबाव बढ़ता है, जिसके कारण तेज़ धड़कन, अनियमित धड़कन, हृदय तक रक्त प्रवाह कम होना और Heart Attack का खतरा बढ़ सकता है। गर्म हवा और प्रदूषण जो भारत के शहरों में सबसे ज़्यादा है — सांस की समस्याएं बढ़ाते हैं, जिनमें एलर्जी, अस्थमा और COPD जैसी बीमारियां शामिल हैं।

Heat cramps (ऐंठन), मांसपेशियों में झटके (spasms), कमज़ोरी, लाल और चिपचिपी त्वचा, अत्यधिक पसीना, Heat rash, लिवर को नुकसान और शरीर के अंदर सूजन (inflammation) भी बढ़ती है। लगातार dehydration किडनी पर दबाव डालती है — जिससे Kidney Failure का खतरा भी बन जाता है।

Warm Nights का दिन से भी बड़ा खतरा क्यों है ?

पहले की पीढ़ी जानती है — रात को छत पर सोते थे, ठंडी हवा आती थी, नींद आती थी। अब रात 11 बजे भी 32-33 डिग्री। पंखा चला तो भी राहत नहीं।यह “थोड़ी ज़्यादा गर्मी” नहीं है। यह मानव शरीर के लिए एक गहरा खतरा है।दिन की गर्मी से शरीर थकता है। रात की ठंडक में शरीर रिकवर करता है। जब रात भी गर्म हो जाए — तो शरीर को रिकवर करने का मौका ही नहीं मिलता। अगले दिन वह और कमज़ोर होता है। यह क्रम चलता रहे तो Heat Stroke, Kidney Failure और Heart Attack का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

Warm Nights” का मतलब है कि रात में भी तापमान सामान्य से ज़्यादा बना रहता है और ठंडक महसूस नहीं होती। इसका कारण यह है कि दिन भर की तेज़ गर्मी ज़मीन, इमारतों और सड़कों में जमा हो जाती है और रात में धीरे-धीरे बाहर निकलती रहती है। लेकिन अगर हवा शांत हो, नमी (humidity) ज़्यादा हो या ऊपर बादल/Heat Dome जैसी स्थिति हो — तो यह गर्मी आसानी से अंतरिक्ष में नहीं निकल पाती और नीचे ही फंसी रहती है। शहरों में यह असर और बढ़ जाता है क्योंकि कंक्रीट और डामर ज़्यादा गर्मी सोखते हैं (Urban Heat Island Effect)।

Warm Nights हर समय नहीं होतीं। अगर रात में ठंडी हवा (wind) चलती है तो वह ज़मीन और आसपास की गर्म हवा को हटाकर उसकी जगह ठंडी हवा ले आती है — इसलिए तापमान जल्दी गिर जाता है और ठंडक महसूस होती है। यानी फर्क बस इतना है — जब हवा चलती है तो ठंडक आती है, और जब नहीं चलती तो गर्मी फंस जाती है।और यह सिर्फ इंसानों को नहीं, फसलों को भी नुकसान पहुंचाता है। गेहूं, चावल — ये फसलें रात की ठंडक में दाना भरती हैं। रातें गर्म होने पर पैदावार में भी गिरावट दर्ज होती है — और यह बात अक्सर सामान्य किसानों को पता नहीं होती।

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2047 का ‘विकसित भारत क्या तब भारत रहने लायक भी होगा?

यह सबसे कठिन सवाल है। और इसीलिए सबसे ज़रूरी भी।
वैज्ञानिक एक अवधारणा की बात करते हैं — Wet-Bulb Temperature। जब तापमान और नमी दोनों इतनी अधिक हो जाएं कि पसीना भी न सूखे — तो इंसान का शरीर खुद को ठंडा नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में बाहर रहना — बिना AC के — कुछ घंटों में जानलेवा हो सकता है।

IPCC की रिपोर्टें कहती हैं कि अगर Global Warming 2°C से ऊपर गई, तो भारत के कई हिस्सों में — विशेषकर गंगा के मैदानी इलाकों में — Wet-Bulb Temperature की सीमा बार-बार पार होगी।भारत 2047 तक “विकसित” बनना चाहता है। पर अगर उसके शहरों में बाहर जीना मुश्किल हो जाए — तो विकास किसके लिए? उन अमीरों के लिए जो AC में रहेंगे? या उन करोड़ों के लिए जो बाहर काम करते हैं? प्रकृति किसी के हिसाब से नहीं चलती। यदि भारत प्रकृति के विरुद्ध जाकर विकसित होना चाहता है — तो यह मुमकिन नहीं है।

कौनसी बातें अक्सर नज़रअंदाज़ की जाती हैं ?

ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन रोकना अब केवल “पर्यावरण का मुद्दा” नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। यह अर्थव्यवस्था का मुद्दा है। यह इंसान की जीवित रहने की क्षमता का मुद्दा है।

लेकिन इसकी जगह सब उल्टा हो रहा है अंदमान निकोबार के जो जंगल है वहां लगभग 10 लाख से ज्यादा पेड़ काटे जाएंगे, हसदेव को तो हमने यूं ही छोड़ दिया, ken betwa project में लगभग 98 sq.km yजंगल पानी के नीचे जाने वाला है।

भूजल का अंधाधुंध दोहन बंद नहीं हुआ तो ज़मीन की नमी खत्म होती रहेगी — और तापमान बढ़ता रहेगा। पानी और तापमान का संबंध सीधा है।

शहरों में पेड़ लगाना “Beautification” नहीं, Survival Strategy है। एक पेड़ दस AC के बराबर ठंडक देता है — बिना बिजली, बिना CO₂।

यह गर्मी अमीर-गरीब में फर्क करती है। जिसके पास AC है, वह बचता है। जिसके पास नहीं, वह मरता है। Heat Equity — यानी गर्मी से बराबर सुरक्षा का अधिकार — यह एक नीतिगत सवाल है जिसे हमारी राजनीति ने आज तक नहीं उठाया।

पृथ्वी पर हर रोज़ हज़ारों प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं।वर्तमान में प्रजातियों के विलुप्त होने की दर प्राकृतिक विलुप्त दर से 1,000 से 10,000 गुना अधिक होने का अनुमान है। यह पृथ्वी पर मानव जीवन को सहारा देने वाले महत्वपूर्ण पारिस्थितिक कार्यों जैसे स्थिर जलवायु, वर्षा पैटर्न और उपजाऊ कृषि भूमि के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है।

गायब होती प्रजातियों के बारे में बोलना इंसान ने कब का छोड़ दिया है। अब जहां भी प्रकृति से इंसान को नुकसान होता है, वहां केवल इंसानों के बचाव की बातें होती हैं — गर्मी हो रही है तो ठंडा पिएं, बाहर न निकलें। बाढ़ आए या सूखा पड़े — CRPF इंसानों को बचा लेती है। लेकिन प्रकृति के अन्य जीवों का क्या? हमारी वजह से वे परेशानियां क्यों झेलें? इंसानों का कर्ज़ वे सबसे पहले चुकता कर रहे हैं।

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