world press freedom index। भारत की दबी हुई पत्रकारिता ?

Dhumal Aniket

Publisher - Forest Timbi Media

World Press Freedom Index

30 अप्रैल 2026 को Reporters Without Borders (RSF) ने World Press Freedom Index 2026 जारी किया। 180 देशों की इस सूची में भारत का स्थान है 157वाँ। 2025 में यह 151 था, यानी एक साल में छह पायदान नीचे आई।यह है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पत्रकारिता।मुझे तो नहीं लगता कि यह जानकर किसी भारतीय को कुछ बुरा लगा होगा।

इस रिपोर्ट की एक लाइन विशेष रूप से ध्यान खींचती है — RSF ने लिखा कि पर्यावरण संबंधी खबरें लिखने वाले पत्रकारों की स्थिति ‘अत्यंत चिंताजनक’ है। यह आलेख उसी चौराहे पर खड़ा है। जहाँ पत्रकारिता और पर्यावरण मिलते हैं, और जहाँ दोनों को एक साथ दबाया जाता है।पर्यावरण संबंधी मुद्दों को कवर करने वाले लगभग 30 पत्रकारों की हत्या हुई है जिसमें भारत के 13 पत्रकार शामिल है।

यह काम मुश्किल इसलिए है क्योंकि जब कोई पत्रकार अवैध खनन, जंगलों को काटते समय पत्रकारिता करने जाता है, आवाज उठाने जाता है, सच्चाई को देश के सामने लाने के लिए जाता है।तब तमाम तरह की दिक्कतें आती है जिसमें जान से मारने की धमकी, उसके साथ गलत बर्ताव या फिर उसके सामानों के साथ छेड़छाड़।

औद्योगिक क्षेत्रों से बिना प्रक्रिया के पानी को नदियों में छोड़ा जाता है आज भी। भारत के कोई भी, किसी भी नदी के तट पर जाकर के यह देख सकता है। आखिर यह सब होता क्यों है ? आसान सी बात है कि वहां के जो स्थानिक अधिकारी होते हैं और बड़े-बड़े कंपनियों के जो मालिक होते हैं उनके बीच में समझौता हुआ होता है।

आपको यह जानकर आश्चर्य नहीं होगा कि आप जो उपयोग की चीजें खरीदते हो उनके द्वारा निकला गया Industrial Waste हमारे ही आसपास के नदियों में जाता है। जो कि आगे जाकर के उसे नदी का जो पारिस्थितिकी तंत्र है उसे बिगाड़ देता है। बिगड़ गया है।

भारत के कुछ पत्रकार जिनकी हत्या हुई

दुनिया के सबसे धोकादायक उद्योगों,कार्यों में पत्रकारिता शामिल है। जिसमें जान जाने का खतरा है। दुनिया में यदि 10 पत्रकारों की हत्या होती है तो उनमें से ९ पत्रकारों के हत्यारों का पता नहीं लगता है।

1.जगमोहन रेड्डी (Jaganmohan Reddy) – अप्रैल 2026: आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में एक स्थानीय समाचार पत्र के पत्रकार जगमोहन रेड्डी की 28 अप्रैल, 2026 को धारदार हथियारों से हत्या कर दी गई। बताया जा रहा है कि उन्होंने इलाके में चंदन की तस्करी (sandalwood smuggling) पर रिपोर्टिंग की थी, जिसके बाद उन पर हमला हुआ।हालांकि पुलिस व्यक्तिगत रंजिश की जांच कर रही है, लेकिन पत्रकार संगठनों ने इसे तस्करी माफिया के खिलाफ उनकी रिपोर्टिंग से जोड़कर देखा है।”

2.मुकेश चंद्राकर (Mukesh Chandrakar) – जनवरी 2025: छत्तीसगढ़ के बस्तर के पत्रकार मुकेश चंद्राकर का शव 3 जनवरी, 2025 को एक सेप्टिक टैंक से बरामद हुआ था। उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल बस्तर जंक्शन पर एक सड़क निर्माण प्रोजेक्ट में 120 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार का खुलासा किया था। इस मामले में एक ठेकेदार और उसके भाइयों को गिरफ्तार किया गया है। यह वे पत्रकार थे जहां पर नक्सलियों का दबदबा है वहां पर पत्रकारिता करते थे।

3.राजीव प्रताप सिंह (Rajeev Pratap Singh) – सितंबर 2025: उत्तराखंड के उत्तरकाशी में freelancer पत्रकार और youtube creator राजीव प्रताप का शव गायब होने के 10 दिन बाद भागीरथी नदी से मिला। उनकी पत्नी के अनुसार, उन्हें एक अस्पताल और स्कूल से संबंधित उनकी रिपोर्ट के कारण धमकियां मिल रही थीं। जिसके बाद प्रशासन ने इस मामले की जांच के लिए SIT का गठन किया है।जांच अधिकारी (SIT) ने निष्कर्ष निकाला है कि मौत शराब पीकर वाहन चलाने के कारण हुई दुर्घटना के परिणामस्वरूप हुई है।

पत्रकार के परिवार ने दुर्घटना की थ्योरी को खारिज करते हुए आरोप लगाया है कि स्थानीय भ्रष्टाचार, जिसमें अस्पतालों और स्कूलों में समस्याएं शामिल हैं, पर अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए धमकियां मिलने के बाद उनकी हत्या कर दी गई थी।

एक पत्रकार जिन्हें भरे बाजार में पिटा गया

स्नेहा बर्वे जो उसके स्थानिक इलाके में चल रहे एक नाले के ऊपर अवैध कब्जा किया हुआ था। जिसकी वजह से वहां की सब्जी मंडी में खराब और दूषित पानी आ रहा था। वहां पर स्नेहा बर्वे अपने कैमरामैन के साथ रिपोर्टिंग कर रही थी।तभी स्थानीय व्यवसायी पांडुरंग मोर्डे ने लकड़ी का बड़ा डंडा उठाया और उन्हें तब तक मारता रहा जब तक वे बेहोश नहीं हो गईं। कैमरामैन अज़ाज़ शेख जब रिकॉर्डिंग करता रहा, तो उस पर भी हमला किया गया। बचाने आए दर्शकों की भी पिटाई हुई — किसी का हाथ टूटा, किसी की नाक। इस दर्दनाक हमले में स्नेहा बर्वे 48 घंटे तक बेहोश रही। वह कहती है की जो आरोपी है – पांडुरंग मोर्डे उस पर स्थानिक पोलिस प्रशासन ने मामूली धाराएं लगा दी है।

RSF का World Press Freedom Index कैसे तय होता है ?

RSF का World Press Freedom Index किसी देश में पत्रकारिता की असली स्थिति को समझने का एक व्यापक पैमाना है। यह सिर्फ यह नहीं देखता कि पत्रकारों पर हमले हुए या नहीं, बल्कि यह भी परखता है कि मीडिया का मालिक कौन है, सरकार उसे किस तरह प्रभावित करती है, कानून उसकी रक्षा करते हैं या फँसाने के काम आते हैं, और समाज में पत्रकारिता को कितनी जगह और इज़्ज़त मिलती है। राजनीतिक, आर्थिक, कानूनी, सामाजिक और सुरक्षा — इन पाँचों मानकों को मिलाकर एक weighted score बनता है, जो 180 देशों की रैंकिंग तय करता है। भारत इस सूची में 2026 में 157वें स्थान पर है, जो इस बात का संकेत है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पत्रकारिता का माहौल कागज़ पर जितना स्वतंत्र दिखता है, ज़मीन पर उतना है नहीं।

World Press Freedom Index
World Press Freedom Index

World Press Freedom Index भारत का 13 साल का रिकॉर्ड

वर्ष रैंकिंग बदलाव
2014140
2015136▲ 4 सुधार
2016133▲ 3 सुधार
2017136▼ 3 गिरावट
2018138▼ 2 गिरावट
2019140▼ 2 गिरावट
2020142▼ 2 गिरावट
2021142→ कोई बदलाव नहीं
2022150▼ 8 गिरावट
2023161▼ 11 गिरावट (अब तक की सबसे बुरी)
2024159▲ 2 सुधार
2025151▲ 8 सुधार
2026157▼ 6 गिरावट

25 वर्षों के इतिहास में पहली बार, 180 में से 90 से अधिक देश ‘कठिन’ या ‘अत्यंत गंभीर’ श्रेणी में आए हैं। भारत के पड़ोसी देशों की तुलना में नेपाल 87वें, श्रीलंका 134वें, भूटान 150वें और पाकिस्तान 153वें स्थान पर हैं।

पर्यावरणीय विषयों पर पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों की हालत क्या है ?

RSF की रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि पर्यावरण विषयों पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की स्थिति देश में ‘बेहद चिंताजनक’ है। जब कोई पत्रकार किसी नदी की मौत लिखता है, किसी जंगल के कटने की खबर छापता है, या किसी खनन माफिया को उजागर करता है — तो वह सिर्फ एक खबर नहीं लिख रहा, वह किसी के स्वार्थ पर चोट कर रहा है।

यूनेस्को (UNESCO) की ‘Press and Planet in Danger’ रिपोर्ट के अनुसार, 70% पर्यावरण पत्रकार काम के दौरान हमलों, धमकियों या दबाव का सामना करते हैं। 2009-2023 के बीच 44 पत्रकारों की हत्या हुई, जबकि 60% ने ऑनलाइन उत्पीड़न और 45% ने सुरक्षा के डर से सेल्फ-सेंसरशिप(स्वयं को चुप रखना) का सामना किया।जो यह दर्शाता है कि धरती को बचाने की आवाज़ उठाने वालों की सुरक्षा आज एक वैश्विक चुनौती बन गई है।

Committee to Protect Journalists (CPJ) के अनुसार, पत्रकारों को ‘भ्रष्टाचार उजागर करने, पर्यावरण की बर्बादी दिखाने और वित्तीय गड़बड़ियों की रिपोर्टिंग करने पर’ गिरफ्तार किया जाता है।

भारत में सरकार कानूनों का गलत इस्तेमाल कैसे कर रही है ?

भारत में पत्रकारों को चुप कराने के लिए जिन कानूनों का सबसे अधिक इस्तेमाल हो रहा है। UAPA, मानहानि (defamation) कानून, राजद्रोह और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून। RSF के अनुसार, ‘कानूनी ढाँचे को तेज़ी से न्यूज़रूम को चुप कराने के लिए हथियार बनाया जा रहा है।

UAPA क्या है ?

UAPA (Unlawful Activities prevention Act) एक सख्त anti-terror कानून है जिसका उपयोग आतंकवाद रोकने के लिए होता है, लेकिन पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन की गिरफ्तारी — जो 2020 में हाथरस दलित गैंगरेप केस की रिपोर्टिंग करने जाते समय हुई और जिसमें उन्हें करीब 28 महीने जेल में रहना पड़ा इसके संभावित दुरुपयोग की बहस को केंद्र में ले आती है।

Censorship क्या है ?

सेंसरशिप उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें सरकार या सत्ताधारी संस्थाएं खबरों, डिजिटल कंटेंट या फिल्मों को नियंत्रित या दबा देती हैं, और डिजिटल युग में यह प्लेटफॉर्म्स से खबर हटाने के रूप में भी सामने आती है। आज इसका उपयोग सबसे ज्यादा दिख रहा है।

भारत में Digital Censorship का स्वरूप अब काफी तेज़ और सख्त हो गया है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण 2023 में आई BBC डॉक्यूमेंट्री ‘इण्डिया: द मोदी क्वेश्चन’ है, जिसे सरकार ने IT नियमों की आपातकालीन शक्तियों का उपयोग कर यूट्यूब और ट्विटर (X) से पूरी तरह ब्लॉक कर दिया था।

Sedition (देशद्रोह)

आलोचना को अपराध बनाने की कोशिश वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ पर COVID-19 के दौरान सरकार की आलोचना करने के कारण देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सरकार की आलोचना तब तक देशद्रोह नहीं है जब तक उसमें हिंसा के लिए उकसावा न हो।

Defamation क्या है?

मानहानि का कानून किसी की प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाने वाली अप्रमाणित(बिना सबूत की) जानकारी प्रकाशित करने पर लागू होता है, और इसके तहत कई पत्रकारों को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से जुड़ा एक चर्चित defamation मामला तब सामने आया जब उन्होंने एक यूट्यूबर के खिलाफ लगभग ₹50 करोड़ का मानहानि दावा दायर किया। यह विवाद उस वीडियो को लेकर था जिसमें

The Caravan की एक रिपोर्ट के आधार पर उनके कथित व्यावसायिक संबंधों पर सवाल उठाए गए थे। गडकरी ने इसे पूरी तरह झूठा और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला बताते हुए कानूनी कार्रवाई की, जिसके बाद पुलिस स्तर पर FIR, पूछताछ और डिजिटल उपकरणों की जांच जैसी प्रक्रियाएं भी शुरू हुईं। इस घटना ने मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया कि क्या किसी प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर सवाल उठाना भी मानहानि की श्रेणी में आ सकता है, या यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।

पर्यावरण की रक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता — ये दो अलग मुद्दे नहीं हैं। जब किसी नदी को बचाने वाले आदिवासी की आवाज़ उठाने वाले पत्रकार पर UAPA लगता है, तो नदी भी मरती है और पत्रकारिता भी।

भारत में पत्रकारों को चुप कराने के लिए जिन कानूनों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है — UAPA, मानहानि कानून, राजद्रोह (sedition), और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून हैं। RSF के अनुसार ‘कानूनी ढाँचे को तेजी से न्यूज़रूम को चुप कराने के लिए हथियार बनाया जा रहा है।’

Media channels कुछ चंद हाथों से चलाए जा रहे हैं

RSF के मुताबिक भारत में मीडिया का स्वामित्व तेजी से कुछ बड़े कॉर्पोरेट घरानों के पास सिमट रहा है। एक तरफ ‘गोदी मीडिया’ का उदय हुआ है, दूसरी तरफ स्वतंत्र मीडिया के लिए विज्ञापन बंद करके आर्थिक गला घोंटा जाता है।
जब पर्यावरण की खबरें उन्हीं उद्योगों को नुकसान पहुँचाती हैं जो मीडिया के मालिक हैं — तो संपादक की कलम खुद ही रुक जाती है। यही ‘self-censorship’ है — जो किसी FIR से ज्यादा खतरनाक है।

मीडिया घराना मालिक TV चैनल Print Digital
Reliance Industries मुकेश अंबानी CNN-News18, News18, Colors JioCinema
Adani Group गौतम अडानी NDTV, NDTV India NDTV.com
Times Group साहू जैन परिवार Times Now, ET Now Times of India, Economic Times TimesofIndia.com
Essel Group सुभाष चंद्रा Zee News, WION Zee Digital
India Today Group अरुण पुरी Aaj Tak, India Today TV India Today IndiaToday.in
KK Media/Birla Group शोभना भारतिया Hindustan Times Livemint.com
ABP Group सरकार परिवार ABP News Anandabazar Patrika ABPLive.com
The Hindu Group N. Ram The Hindu TheHindu.com

निष्कर्ष

जब मुख्यधारा मीडिया ने आँखें बंद कीं, तब YouTube चैनलों, स्वतंत्र पोर्टलों और सोशल मीडिया पर पत्रकारिता ने साँस ली। लेकिन यही नए मंच अब नए खतरों से घिरे हैं — चैनल ब्लॉक होना, Income Tax छापे, और non-profit status रद्द होना।नई पीढ़ी के पत्रकार आज कैमरा लेकर उन जंगलों में जाते हैं जहाँ बड़े मीडिया हाउस की गाड़ियाँ नहीं पहुँचतीं। यह उम्मीद है — लेकिन यह उम्मीद तब तक जिंदा रह सकती है जब तक कानून और सत्ता उसे कुचले नहीं।157वाँ नहीं, पहले होना चाहिए।भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव नहीं — उसका मतलब है कि हर नागरिक सच जान सके। और सच तब ही पहुँचता है जब पत्रकार निडर होकर लिख सके।157वाँ स्थान सिर्फ एक संख्या नहीं है — यह उन पत्रकारों की कहानी है जो जेलों में हैं, उन खबरों की कहानी है जो कभी छपी नहीं, और उन नदियों, जंगलों और पहाड़ों की कहानी है जिनकी आवाज़ कोई नहीं सुन सका।

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