Clinical trials in human|दवाईयों का क्लिनिकल ट्रायल कैसे किया जाता है?|1|

Dhumal Aniket

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Publisher - Forest Timbi Media

Clinical trials in human

जब भी हम बिमार होते है । तो हम सबसे पहले पास है कि केमिस्ट के पास चले जाते है और दवाई खरीदकर हम उसे खा लेते है। दवाई खाने के कुछ समय बाद हम ठीक भी हो जाते है लेकिन क्या आपको पता है की ये दवाईया बनाने में कितना समय लगता है और दवाईयाँ की परिस्थितीयों में तयार होती है(clinical trials in human)। भारत का फार्मासिटिकल उद्योग दवाईयाँ बनाने में दुनियाँ में तिसरे स्थान पर है। तो अमेरिका पहिले स्थान पर है।

दवाईयों की खोज कैसे की जाती है ?

औषधि/दवाई की खोज एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य बीमारी को ठीक करने और उपचार करने में चिकित्सीय रूप से उपयोगी यौगिक की पहचान(identify a compound) करना है। जिसमे कई सारी प्रक्रिया हो का समावेश है।
यह जो कंपाउंड है वह हमारें शरीर के लिए अनुकूल होना चाहिए। वही हमारी बिमारी को ठीक करने की क्षमता उसमें होनी चाहिये।

औसतन दस लाख अणुओं (molecules) की जांच की जाती है, लेकिन केवल एक को ही अंतिम चरण के clinical trials (​​परीक्षणों) में खोजा जाता है और अंततः रोगियों के लिए उपलब्ध कराया जाता है ।

दवाई की खोज से लेकर लोगों को पहुचाने तक वह करीब १२-१५ साल  का समय लगता है।
दवाईयों को विकसित करने के लिए उसकी काई तरीको से जांच की जाती है। दवाईयो के अणू (molecules)के अध्ययन में बिमारी को ठीक करने की क्षमता देखते हुए उसका प्री-क्लिनिकल (preclinical trial)परीक्षण होता है।
कोई भी किसी भी प्रकार की दवाई अगर लोगो के लिए उपलब्ध करनी है तो उसके लिए सबसे पहले मानवी परीक्षण से पहिले दवाई का पशुओं में परीक्षण किया जाता है।

Pre- clinical Testing के लिए क्या करना होता है?

Clinical trials in human

Pre- clinical Testing में इसका उपयोग पशुओं के उपर किया जाता है। इसमे दवा की सुरक्षा और उसका पशु के ऊपर प्रभाव देखा जाता है और इसी से निष्कर्ष/अनुमान लगाया जाता है कि दवाई इंसानो मे कैसे काम करेगी।
Pre clinical testing में चूहे,खरगोश,गिनी सुअर और कई तरह के पक्षियों का भी इस्तेमाल किया जाता है। अगर दवाई की toxicity स्टडी अच्छे से करनी है तो विशिष्ट प्रजाती के पशुयों की जरूरत पडती है और उनका उपयोग भी किया जाता है।

इंसानो मे क्लीनिकल ट्रायल कैसे किया जाता है?


क्लिनिकल ट्रायल खास तौर पर सुरक्षा और दवाई का प्रभाव देखने को किया जाता है। इंसानो मे क्लिनिकल ट्रायल करने के लिए समय और पैसा दोनो बहुत जरुरी है।

क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री इंडिया (CTRI) के अनुसार, भारत में वर्तमान में कुल ५५,००० से ज्यादा क्लिनिकल ट्रायल या तो किये गये है और कई सारे अभी भी चल रहे है ।भारतीय क्लिनिकल ट्रायल बाज़ार का मूल्य 2.07 बिलियन डॉलर होने का अनुमान है। 2030 तक बाज़ार का आकार 3.88 बिलियन अमरीकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है।

क्लीनिकल ट्रायल की मुख्य रूप से चार भाग होते है
1.Phase-0-Clinical trial
2.Phase-1- सुरक्षा और डोस(Safety and efficacy)
3.Phase-2- प्रभाव और दुष्प्रभाव(Efficacy and side effects)
4.Phase-3- परिणाम और दवा की प्रतिक्रिया(Adverse drug reactions monitoring)
5.Phase-4-बाजार के बाद दवा की सुरक्षा और निगरानी

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Clinical trials in human

1.Phase-0-Clinical trials in human


फेज 0 शुरू करते से पहिले FDA(Food and drug Administration)की अनुमती की जरुरत पडती है । FDA के दिशा निर्देशो के द्वारा clinical trials की शुरुवात होती हैं।

इसमे १०से १५ लोगों को काफी छोटी मात्रा में दवाई का डोस दिया जाता है।

2.Phase-1- सुरक्षा और डोस(Safety and efficacy)

Phase 1 trial के पहले test में अच्छी सेहत वाल कम लोगों का समुह होता है। ज्यादा तर मामलों में २० से ८० अच्छी सेहत वाले रोगी/ बिमार लोगों को फेज वन में लिया जाता है।

शोधकर्ताओं ने पशु अध्ययन के आंकड़ों के आधार पर खुराक/डोस के नियम को तय किया है ताकि यह पता लगाया जा सके कि दवा की कितनी खुराक/डोस शरीर सहन कर सकता है और कितना तीव्र दुष्प्रभाव।
यह चरण अध्ययन के  के लिए अनिवार्य है, लगभग जितनी भी दवाईयों का क्लिनिकल ट्रायल किया जाता है उनमें से ७०% दवाएं अगले चरण में पहुंचती हैं।

3.Phase-2- प्रभाव और दुष्प्रभाव(Efficacy and side effects)


Phase-2 परीक्षण में रोगियों के बड़े समूहों (१००-५००) पर आयोजित किए जाते हैं और इसका उद्देश्य दवा की प्रभावकारिता का मूल्यांकन करना और Phase-1 सुरक्षा मूल्यांकन को पूरा करना है।
शोधकर्ताओं को Phase 2 सुरक्षा के मामले मे ज्यादा माहिती प्रदान करता है।
यह परीक्षण यह पुष्टि करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि दवा परिणामकारक होगी या नहीं।
३३% दवाएं अगले चरण में पहुंचती हैं।

4.Phase-3- परिणाम और दवा की प्रतिक्रिया(Adverse drug reactions monitoring)


Phase-3 में  ३०००-५००० लोगों पर दवाई का परीक्षण किया जाता है और परीक्षण कई सालों तक चलता रहता है।

Phase-3 का उद्देश्य यह मूल्यांकन करना है कि समान स्थिति के लिए मौजूदा दवाओं की तुलना में नई दवा कैसे काम करती है।
परीक्षण को आगे बढ़ाने के लिए, जांचकर्ताओं को यह प्रदर्शित करना होगा कि दवा कम से कम मौजूदा उपचार विकल्पों की तरह सुरक्षित और प्रभावी है। ऐसा करने के लिए, जांचकर्ता रैंडमाइजेशन नामक एक प्रक्रिया का उपयोग करते हैं।
नई दवा को मंजूरी देने से पहले FDA को आमतौर पर Phase-3 के clinical trial की आवश्यकता होती है। लोगों की बड़ी संख्या और लंबे समय तक चले इस चरण के दौरान दवाई के दुर्लभ और दीर्घकालिक दुष्प्रभाव दिखाई देने की  संभावना अधिक है।
जांचकर्ता प्रदर्शित करते हैं कि दवा कम से कम उतनी ही सुरक्षित और प्रभावी है । जितनी पहले से ही बाजार में मौजूद अन्य दवाएं और इसके साथ FDA दवाई को बाजार में लाने की मंजुरी देता है।

5.Phase-4-बाजार के बाद दवा की सुरक्षा और निगरानी


१२-१५ साल की मेहनत के बाद दवाई लोगों के लिए उपलब्ध कराई जाती है।
Phase-4 में दवा की जांच डॉक्टर के निगरानी में कि जाती है। दवा के दुर्लभ दुष्प्रभावों और सुरक्षा सहित दुष्प्रभावों के बारे में अधिक जानकारी शोधकर्ताओं को लोगों के द्वारा उपलब्ध होती है।
इसमे दीर्घकालिक जोखिम और लाभ क्या हैं ये जानने में सहायता होती है।

दवा कितनी अच्छी तरह काम करती है जब इसका उपयोग Phase 3 परीक्षण में शामिल नहीं किए गए लोगों के लिए अधिक व्यापक रूप से किया जाता है । क्लीनिकल ट्रॅव्हल्स मे सीमित लोग होते है। लेकिन जब दवाई बाजार में आ जाती है तब इसका बिमार आदमी के उपर कैसा असर रहता है यह देखने को मिलता है।


पैसे, प्रयोग और पशु: क्लिनिकल ट्रायल्स में जानवरों के उपयोग पर सवाल होना चाहिए

जब भी कोई नई दवा या वैक्सीन बनती है, तो उसे इंसानों पर उपयोग से पहले जानवरों पर परखा जाता है। यह प्रक्रिया वैज्ञानिक दृष्टि से “सुरक्षा जांच” के लिए जरूरी मानी जाती है। लेकिन क्या यह सही है? क्या पैसे और प्रगति की होड़ में हम पशुओं की पीड़ा को नजरअंदाज कर रहे हैं?

क्लिनिकल ट्रायल में पशुओं का उपयोग क्यों होता है?

दवाओं या रसायनों के प्रभाव को इंसानों पर उपयोग से पहले परखने के लिए जानवरों – जैसे चूहे, बंदर, खरगोश आदि – का प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया को प्री-क्लिनिकल ट्रायल कहते हैं। इसका उद्देश्य यह जानना होता है कि दवा कितनी प्रभावी है और उसके साइड इफेक्ट्स क्या हो सकते हैं।

पशुओं पर ट्रायल: नैतिकता पर सवाल

  • जानवर बोल नहीं सकते, विरोध नहीं कर सकते – इसलिए वे “आसान विकल्प” बनते हैं।
  • उन्हें कृत्रिम रूप से बीमार बनाकर उपचार दिया जाता है – जो स्वाभाविक नहीं है।
  • एक ट्रायल में सैकड़ों जानवरों की मृत्यु या गंभीर कष्ट होता है।

क्या विज्ञान का मतलब संवेदना की बलि देना है?

पैसा, औषधीय बाज़ार और प्रतिस्पर्धा – इन सबके बीच पशु केवल एक “उपकरण” बनकर रह जाते हैं। जबकि वे भी एक जीव हैं, जिनमें दर्द की अनुभूति होती है, डर होता है, और जीने की इच्छा होती है।

क्या विकल्प मौजूद हैं?

आज के समय में विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि अब Non-Animal Testing Methods भी उपलब्ध हैं:

  • In-vitro testing (पेट्री डिश में कोशिकाओं पर परीक्षण)
  • Computer simulations और AI-based models
  • Human-on-a-chip तकनीक
  • 3D printed human tissues

ये तरीके न केवल नैतिक हैं, बल्कि कई बार वैज्ञानिक रूप से अधिक सटीक भी साबित होते हैं।

समाधान की दिशा में कदम

  • सरकारों को Animal Testing के खिलाफ सख्त कानून बनाने चाहिए।
  • रिसर्च फंडिंग उन्हीं प्रयोगशालाओं को मिले जो वैकल्पिक तकनीकों का उपयोग करें
  • आम नागरिकों को भी जागरूक होकर ऐसी दवाओं या कॉस्मेटिक्स से बचना चाहिए जो जानवरों पर परीक्षण के बाद बनते हैं।

पैसे और प्रगति जरूरी हैं, लेकिन उन्हें संवेदना और नैतिकता के साथ संतुलित करना और भी जरूरी है। जानवरों की पीड़ा को अनदेखा कर के हम किस तरह की चिकित्सा प्रणाली का निर्माण कर रहे हैं? यह प्रश्न हर वैज्ञानिक, हर डॉक्टर और हर उपभोक्ता को स्वयं से पूछना चाहिए।

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