क्या पेड़ों को भी याददाश्त होती है ? Tree memory and drought response

Dhumal Aniket

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Publisher - Forest Timbi Media

Tree memory and drought response

tree memory and drought response:जब हम स्मृति की बात करते हैं, तो हमारे मन में मनुष्य या जानवर आते हैं। पर क्या कभी आपने सोचा है कि पेड़ भी अपने अनुभवों को याद रख सकते हैं? हाल ही में कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने यह दर्शाया है कि कुछ पेड़ अपने पूर्व जलवायु अनुभवों — विशेष रूप से सूखा (drought) — को “याद” रखते हैं और अगली बार परिस्थितियां आने पर अपना व्यवहार बदलते हैं।इसे “Tree memory and drought response” कहा जाता है।

पेड़ों का पानी के लिए एक अदृश्य संघर्ष होता है

सूखा केवल मानव जीवन को नहीं, बल्कि पेड़-पौधों को भी गहराई से प्रभावित करता है। पानी की कमी से पत्तियाँ गिरती हैं, वृक्ष की वृद्धि रुक जाती है, और लंबे समय तक जल संकट का असर उसकी पूरी जीवन प्रक्रिया पर पड़ता है।

पेड़ों की “स्मृति” कैसे काम करती है?

1. एपिजेनेटिक बदलाव (Epigenetic Memory) क्या है?

कुछ पेड़ों में यह पाया गया है कि दुष्काल जैसी घटनाओं के बाद उनके DNA की अभिव्यक्ति में बदलाव होता है, जिससे अगली बार उसी परिस्थिति में वे अलग व्यवहार करते हैं। इस तरह की स्मृति को एपिजेनेटिक स्मृति कहा जाता है।

जब पेड़ों को पानी की बहुत कमी झेलनी पड़ती है, तो कुछ प्रजातियाँ इसे “याद” रखती हैं। अगली बार जब फिर से पानी कम होता है, तो ये पेड़ अपने पत्ते कम कर देते हैं, पानी की बचत करते हैं और खुद को नुकसान से बचाते हैं।

यह “याददाश्त” असली दिमाग वाली नहीं होती, लेकिन पेड़ों की भीतर की बनावट (DNA) में बदलाव आ जाते हैं, जिससे वे सीख लेते हैं।

2. संरचनात्मक प्रतिक्रिया कैसे देते हैं?

उदाहरण के लिए, Norway Spruce जैसे वृक्ष सूखे के बाद अपनी पत्तियों का फैलाव घटा देते हैं, ताकि पत्तियों से जलवाष्प का उत्सर्जन कम हो और पानी की बचत हो सके।

इसके अलावा, पेड़ की जल-वाहक नलिकाओं (xylem) में हवा के बुलबुले (embolism) बनने से जल प्रवाह रुक जाता है। कुछ पेड़ सूखे के बाद ऐसी संरचनाओं को बदलकर भविष्य की सुरक्षा करते हैं।

क्या यह क्षमता सभी पेड़ों में होती है?

नहीं। वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि कुछ विशेष प्रजातियाँ ही ऐसी “स्मृति” विकसित करती हैं। उदाहरण:Norway Spruce,Scots Pine.भारत में: चिर पाइन, साग (टिक), चावलइनमें से कुछ में tree memory and drought response जैसी क्षमताएँ पाई जाती हैं।

भारत में क्या यह संभव है?

भारत में इस विषय पर शोध अभी नहीं हुआ है। हालांकि कुछ संभावित प्रजातियाँ जैसे:
चिर पाइन (हिमालय),साग (टिक)चावल जैसे कृषि पौधे इनमें सूखे की सहनशीलता पाई गई है और कुछ में एपिजेनेटिक परिवर्तन की संभावना भी देखी गई है।


एक 4,850 साल पुराना पेड ?


Bristlecone Pine का एक पेड़ कैलिफोर्निया के white mountains में स्थित है। जिसका नाम Methuselah है। जिसकी उम्र लगभग 4,850 वर्ष है।यह पेड़ “non-clonal” है यानी यह एक ही बीज से उगा और आज तक जिंदा है।ये पेड़ साल में केवल कुछ मिलीमीटर बढ़ते हैं। इससे उनकी कोशिकाएं धीरे-धीरे टूटती हैं और नुकसान कम होता है।लकड़ी में रेज़िन भरपूर होता है जो सड़न, कीट और फफूंदी से बचाता है।ये पेड़ कठिन माहौल (सूखा, तेज हवा, कम पोषण) में पनपते हैं – जिससे उनका जीवन लंबा होता है।पेड़ का 80–90% हिस्सा मृत हो सकता है लेकिन शेष हिस्सा सदियों तक ज़िंदा रह सकता है।

Tree memory and drought response
Methusulah tree.The oldest tree in the world.As known human 1

Methusulah नाम क्यों ?

Methuselah नाम के एक व्यक्ति की उम्र थी 969 वर्ष।
वह बाइबल के अनुसार दुनिया का सबसे अधिक वर्ष तक जीवित रहने वाला मनुष्य माना जाता है।इसी वजह से, जब वैज्ञानिकों को यह लगभग 4,800 साल पुराना पेड़ मिला, तो उन्होंने इसका नाम “Methuselah” रखा — क्योंकि यह भी अत्यंत प्राचीन है।

पेड़ों की “याददाश्त” का भविष्य क्या हो सकता है?

बीजों को “प्रशिक्षित” कर के स्मृति विकसित की जा सकती है (Seed Priming)।सूखा-सहिष्णु प्रजातियाँ जंगलों के पुनर्निर्माण में उपयोगी हो सकती हैं।कृषि में एपिजेनेटिक जानकारी से नई किस्में विकसित की जा सकती हैं।Tee memory and drought response अब केवल एक विचार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सत्य बन चुका है।

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निष्कर्ष

पेड़ों की स्मृति केवल एक विचार नहीं, बल्कि प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य बन रहा है। यह दर्शाता है कि पेड़ केवल जीवनदायिनी नहीं, बल्कि अनुभवी और अनुकूलनशील जीव भी हैं। जलवायु परिवर्तन के इस युग में पेड़ों की यह क्षमता भविष्य के लिए हमारी एक बड़ी आशा बन सकती है।

क्या पेड़ों की यह स्मृति अगली पीढ़ियों तक जाती है?

कुछ मामलों में, विशेष रूप से फसली पौधों जैसे चावल में, यह स्मृति बीजों के माध्यम से अगली पीढ़ियों तक जाती है। परंतु जंगल के पेड़ों में यह अभी शोध का विषय है।

क्या भारत में ऐसे पेड़ हैं जो दुष्काल को “याद” रखते हैं?

भारत में इस पर सीमित शोध हुआ है, लेकिन चिर पाइन, साग, और कुछ कृषि फसलें (जैसे तांदूल/चावल) इस क्षमता की संभावना रखते हैं।

पेड़ क्या अन्य पेड़ों से अनुभव साझा कर सकते हैं?

कुछ शोध यह संकेत देते हैं कि पेड़ जड़ों या रासायनिक संकेतों के माध्यम से आसपास के पेड़ों को सतर्क कर सकते हैं, पर यह स्मृति से अलग प्रक्रिया है।

पेड़ों की इस स्मृति का क्या उपयोग हो सकता है?

इससे हम जलवायु-प्रतिरोधक प्रजातियाँ चुन सकते हैं, जंगलों का नवीकरण कर सकते हैं, और खेती में बेहतर बीज विकसित कर सकते हैं।

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