Uttarakhand forest fire : जंगल नहीं,हम जल रहे हैं

Dhumal Aniket

Publisher - Forest Timbi Media

Uttarakhand Forest Fire

Uttarakhand Fore”पिछले दो महीनों से भारत के नक्शे पर कई जगह सुर्ख लाल निशान उभर रहे हैं—ये निशान किसी युद्ध के नहीं, बल्कि हमारे सुलगते जंगलों के हैं। मार्च और अप्रैल के तपते महीनों में उत्तराखंड की पहाड़ियों से लेकर ओडिशा के घने जंगलों तक, ‘फॉरेस्ट फायर’ (Forest Fire) ने तांडव मचा रखा है। लेकिन क्या यह सिर्फ बढ़ते तापमान की एक प्राकृतिक परिणति है, या फिर हमारे भीतर की आध्यात्मिक शून्यता और प्रकृति के प्रति बढ़ती संवेदनहीनता का बाहरी प्रकटीकरण? जब हज़ारों एकड़ में फैली हरियाली चंद घंटों में राख बन जाती है और बेज़ुबान वन्यजीव अपनी जान बचाने के लिए भटकते हैं, तब सवाल सिर्फ़ पर्यावरण का नहीं, बल्कि हमारी मानवता के अस्तित्व का भी खड़ा होता है।”
लेकिन हम आज बात सिर्फ मानवता की नहीं करेंगे मानवता की उसे पहलू की करेंगे जिसे आमतौर पर नजरअंदाज किया जाता है। जहां पर उपभोग के लालसा में एक तरफ जंगल उखड़ते हुए हम आगे जा रहे हैं तो दूसरी तरफ प्रकृति अपने नियमों के विरुद्ध तो नहीं चल सकती। आज जंगलों में लगी आग प्राकृतिक भी हो सकती है और किसी इंसान ने जानबूझकर लगाई हुई आग भी हो सकती है ? लेकिन भारत में फरवरी से लेकर के जून तक Forest fire के ज्यादातर मामले दर्ज होते हैं।

तो आज हम इसी के बारे में पूरे विस्तार से जानेंगे…

जंगलों में आग लगती कैसे हैं ?

सवाल को सबसे ज्यादा नजर अंदाज किया जाता है। साल दर साल forest fire की घटनाएं कम होने की जगह बढ़ती जा रही है। इसके पीछे बहुत दिलचस्प कारण है और हां इसमें तथ्य भी उतना ही है जितना इंसान का प्रकृति के प्रति रवैया। 2026 में उत्तराखंड और हिमालय क्षेत्र में बर्फबारी और बारिश बहुत कम हुई। जिसका नतीजा सूखी घास,सुखे पत्ते और तहतहाती गर्मी। जो जंगलों में आग लगने के लिए एक ईंधन साबित होते हैं। ऐसे में जंगलों में पानी की कमी, नदियों/झरनों का सूखना, नमी को कम करता है। जिससे आग को नियंत्रण में लाने का समय और बढ़ता है। इसमें चीड़ के पेड़ बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं क्योंकि इनकी पत्तियां जल्दी सूखती है और जमीन पर मोटी परत बना देती है जिससे बेहद जल्दी आग पकड़ने में मदद मिलती है। उत्तराखंड के जंगलों में चीड़ के पेड़ बहुत ज्यादा पाए जाते हैं।

ज्यादातर जंगल में लगने वाली आग इंसान के लापरवाही की वजह से होती है। मतलब वह प्राकृतिक नहीं होती। आमतौर पर सिगरेट /बीड़ी फेंकना, कचरा जलाना, या जानबूझकर आग लगाकर छोड़ देना या कहीं ट्रैकिंग पर गए तो वहां पर लापरवाही दिखाना। इसकी वजह से एक छोटी सी चिंगारी पूरे जंगल को तबाह कर देती है। ऐसे मामलों के लिए जो व्यक्ति जिम्मेदार है वह आसानी से पता भी नहीं चलता।

2026 में उत्तराखंड Forest fire की स्थिति क्या है?

Uttarakhand Forest Fire

तापमान में लगातार वृद्धि के कारण उत्तराखंड के जंगलों में आग लग गई है, और 208 स्थानों से आग लगने की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें 130 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि प्रभावित हुई है। लगभग 3 महीने पहले सर्दियों के मौसम में भी जंगलों में आज के घटनाएं सामने आई थी।

उत्तरकाशी वन विभाग में 8 घटनाएं दर्ज की गईं जिनसे 12.65 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ, जबकि पिथौरागढ़ वन विभाग में 14 घटनाएं हुईं जिनसे 11.25 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ। केदारनाथ वन्यजीव वन विभाग में आग लगने की 20 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनसे 10.5 हेक्टेयर वन क्षेत्र क्षतिग्रस्त हुआ।

अलकनंदा मृदा संरक्षण गोपेश्वर वन प्रभाग में 17 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनसे 9.7 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ, जबकि,पौड़ी वन विभाग में आग लगने की 13 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनसे 6.7 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ। इसके बाद चकराता वन विभाग में आग लगने की 7 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनसे 4.7 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ।मृदा संरक्षण कलासी वन प्रभाग में 5 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनसे 8.5 हेक्टेयर क्षेत्र को नुकसान पहुंचा।

नरेंद्र नगर वन विभाग में आग लगने की 5 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनसे 4 हेक्टेयर वन भूमि को नुकसान पहुंचा। नई टिहरी वन विभाग में आग लगने की 5 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनसे 3.8 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ, जबकि टोंस पुरोला वन विभाग में आग लगने की 9 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनसे 2.7 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ।

रुद्रप्रयाग स्थित उत्तराखंड वन विभाग ने इस मौसम फरवरी से अप्रैल में लगभग 171 हेक्टेयर भूमि को प्रभावित करने वाली 150 से अधिक वन अग्निकांड की घटनाओं की सूचना दी है। हालांकि यह आंकड़े कहीं गुना अधिक हो सकते हैं।

बढ़ते फॉरेस्ट फायर की घटनाओं के कारण उत्तराखंड में पर्यटकों की संख्या कम होती जा रही है। अल्मोड़ा जैसी जगह है इससे काफी प्रभावित है। भीषण गर्मी के कारण लोग ज्यादातर घूमने के लिए बाहर नहीं निकल रहे हैं।

जंगलों में लगी आग को Detect कैसे किया जाता है ?

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया के अनुसार भारत में नवंबर 2020 से लेकर 21 तक MODIS(Moderate Resolution Imaging Spectro-Radiometer) सेटेलाइट में लगी इस सेंसर का इस्तेमाल करके 52785 बार जंगल में आग लगने का पता लगाया गया।

SNPP-VIIRS(Suomi-National Polar-orbiting Partnership – Visible Infrared Imaging Radiometer Suite) इस सेंसर के द्वारा 3,45,989 बार लगने वाली आज घटनाओं का पता लगाया यह घटनाएं हर साल बढ़ती जा रही है। यह सेंसर 24 घंटे में छह बार आग घटनाओं की जानकारी वन विभागों को देता रहता है। यह दोनों सेंसर नासा क के एक्वा और टेरा सेटेलाइट पर लगे हुए हैं ।

2026 में आग ज्यादा क्यों दिख रही है?

दुनिया के सबसे उष्णता के शहर भारत में है। भारत अब गर्मी का अड्डा बन गया है। भारत में लगातार जंगलों को काटा जा रहा है जहां पर Ken betwa link project के जरिए पन्ना टाइगर रिजर्व का कुछ हिस्सा काटना हो या मुंबई में 45000 Mangroves trees को वर्सोवा-भयंदर मार्ग के लिए काटना हो जिसके लागत 18,263 करोड़ है।

क्या हमारे पास वर्तमान डेटा है या हम पुराने आंकड़ों पर निर्णय ले रहे हैं? या फिर जानबूझकर हम इस आग को रोकना नहीं चाहते हैं।

हम ऐसे पेड़ लगा रहे हैं जो जल्दी आग पकड़ते हैं (जैसे पाइन)। “मोनोकल्चर” (एक ही प्रकार के पेड़) जंगल को ज्यादा असुरक्षित बनाता है। जबकि प्राकृतिक मिश्रित जंगल ज्यादा सुरक्षित होते हैं। जो भारत में बहुत कम बचे हैं।
आप भारत के लगभग हर सड़क को देखें तो एक ही प्रकार के पेड़ देखेंगे। जबकि ऐसा करना उसे पेड़ के लिए और वहां की जमीन के लिए ज्यादा मददगार साबित नहीं होता। यहां पर सवाल आता है कि क्या हमारे शिक्षा व्यवस्था में इतनी बेसिक जानकारी तक हमें पता नहीं है कि किस तरीके के पेड़ लगाए जाने चाहिए ?

भारत भौगोलिक रूप से एक ऐसी जगह पर है जहां पर मिट्टी, पानी, हवा, मौसम सब ठीक है। लेकिन हर जगह के कुछ विशेषताएं हैं वहां पर वही वनस्पतियां आती है जिसके लिए उसे जगह का वातावरण अनुकूल हो। स्थानीय पेड़ पौधों की प्रजातियां को बढ़ावा देने के बजाय भारत में एक ही प्रकार के पेड़ लगाए जाते हैं। जो की प्रकृति के प्रति अज्ञान को यह दर्शाता है।

स्थानीय लोगों की भूमिका क्यों नहीं समझी जाती?

आदिवासी और स्थानीय लोग जंगल को “संसाधन” नहीं, “जीवन” मानते हैं — तो उनकी बात क्यों नहीं सुनी जाती? क्या उन्हें केवल “आरोपी” बनाना आसान है? क्या उनकी पारंपरिक जानकारी (traditional knowledge) आग रोकने में मदद कर सकती है? क्या इसके बारे में हम कभी सोचना भी चाहते हैं। या फिर अपने ही मनमर्जी करके ken betwa जैसे प्रोजेक्ट लॉन्च करना चाहते हैं। जितने भी नई परियोजनाएं होती है उसके तहत सरकार वहां के स्थानिकों को नजरअंदाज करती है, उन्हें घसीटती है, उन्हें अपने निर्णय से कोसों दूर लाकर खड़ी रख देती है और अपना निर्णय उन पर थोप देती है। जिसका नतीजा यह होता है कि उनके पास जो सदियों से चला आ रहा ज्ञान शहरों की तरफ चला जाता है। और हम कुछ चंद लोगों को लेकर आग बुझाने में व्यस्त रहते हैं।

Forest Timbi के कुछ सवाल जो आपको सोचने पर मजबूर करेंगे

सरकार की योजनाएं कितनी ग्राउंड लेवल तक पहुंचती हैं? क्या फॉरेस्ट गार्ड्स के पास पर्याप्त संसाधन और ट्रेनिंग है? क्या टेक्नोलॉजी (satellite monitoring) का सही उपयोग हो रहा है?

क्या हम हर बार “लोगों की गलती” कहकर असली कारणों से बच जाते हैं? क्या मीडिया सिर्फ सनसनी दिखाता है, समाधान नहीं? क्या हम जंगल को “बाहरी चीज” मानते हैं, जबकि हम खुद उसी का हिस्सा हैं?

जब हमें इन सवालों का जवाब ईमानदारी से देंगे तो हमें पता चलेगा कि हमने प्राकृतिक भंडारों के साथ कितना दुर्व्यवहार किया है। हमारे भीतर के अधूरेपन को भरने के लिए हमने अपने प्राकृतिक भंडारों को खा लिया। लेकिन फिर भी हम अधूरे हैं। स्वार्थ और लालच से भरे पड़े हैं। फिर भी हम अपने जंगलों को काटे जा रहे हैं, हवा को दूषित कर रहे हैं और अपनी आबादी लगातार बढ़ा रहे हैं। लेकिन इसका अंजाम क्या होगा ? इसके संकेत पृथ्वी दे रही है। भारत जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी मार झेल रहा है। जब तक हम भीतर के अज्ञान को नहीं देखेंगे तब तक बाहर जंगल ऐसे ही जलते रहेंगे। गर्मी ऐसे ही बढ़ती रहेगी और वह दिन आएगा जब हम मृत्यु के सामने होंगे तब तक काफी देर हो चुकी होगी।

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