vanishing caves in india
महाराष्ट्र की मशहूर गुफाओं के बारे में आपने सुना ही होगा जिसमें महाराष्ट्र की पर्यटन राजधानी संभाजी नगर जिले में स्थित अजंता और वेरुल की गुफाएं पूरी दुनिया में मशहूर है और उन्हे यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में रखा गया है लेकिन आज हम बात करेंगे महाराष्ट्र के लातूर जिले में स्थित खरोसा गांव के गुफाओं की जो लुप्त होने की कगार पर है।
खरोसा की गुफाओं की क्या विशेषताएं है ?
खरोसा गांव के किनारे पर स्थित एक पहाड़ी पर १२ गुफाएं मौजूद है। ऐसा माना जाता है कि यह गुफाएं छठीं शताब्दी में बनाई गई है। इन १२ गुफाओं में हिंदू और बौद्ध धर्म की अद्भुत नक्काशी/कलाएं आपको देखने को मिलेगी। इस पहाड़ की चट्टान पर की गई अनेक नक्काशी कई जगह पर स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती है। पहले गुफा में गौतम बुद्ध की रंग दि हुई मूर्ति है।

यहां की गुफाएं कमजोर पत्थर पर बनाई गई है। इसलिए साल दर साल वहां की चट्टान कमजोर हो जाती है। इन गुफाओं की विशेष बात यह है कि, इनमें से दो गुफाएं दो मंजिल की है।यह गुफाएं जिस चित्र को दर्शाती है, वही चित्र, वही कला अजंता की गुफाओं में देखने को मिलती है। गुफाएं पुरानी होने के कारण अंदर के कुछ स्तंभ गिरे हुए हैं। यह गुफाएं कमाल की वास्तुकला होने के कारण अभी भी टिकी हुई है। यहां पर एक गुफा में शिवलिंग है। शिवलिंग की पूजा करनी हेतू गांव के कुछ लोग हर सोमवार यहां पर आते हैं। इस गुफा के नक्काशी में विष्णु के अवतारों का रूप देखने को मिलता है। यहां पर नरसिंह, कार्तिकेय और रावण कि मूर्तियां शामिल है। स्त्री और पुरुषों के विभिन्न आभूषण और नृत्यकला के साथ समुद्र मंथन की कहानी भी हमें यहां पर देखने को मिलती है। अनेक विशेषताओं से भरपूर यह गुफाएं हमें अपनी सभ्यताओं को हमारे प्राचीन जीवन को दर्शाती है। उन प्राचीन समय में इनको बनाना यह एक अतुलनीय काम था। कैसा रहा होगा उस समय का जीवन, उस समय की बाधाएं, उस समय का ज्ञान। हमें उत्सुकता होती है, उस चीज को जानने की उसी की निशानी यह गुफाएं हमें प्रस्तुत करती है।
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भारत की गुफाएं क्यों लुप्त हो रही है?
हमने बात की गुफाओं के विशेषताओं कि, लेकिन समय के साथ इन गुफाओं की सुरक्षा में कुछ कमियां है, कुछ कमियां है, इनकी देखरेख करने में। बारिश के मौसम में इन गुफाओं में ऊपर से पानी आता है। यह पानी मौसम खत्म होने तक रहता है पानी के साथ-साथ गंदगी भी फैलती जाती है। कचरा तो लोगों के द्वारा पहले से ही मौजूद है। इन गुफाओं की दीवारों पर अज्ञान से भरे हुए लोगों ने अपने नाम लिखवाए हैं। स्थानिक प्रशासन से यह गुफा काफी दूर है। प्रशासन के द्वारा कार्य न करने के कारण कई सारे लोग इसे भेट नहीं देना चाहते हैं । अगर कुछ पैमाने पर यहां की गुफाओं को सुविधा के साथ सुरक्षा उपलब्ध की जाए, तो लोगों के लिए यह एक आकर्षण का केंद्र बन सकता है। कुछ साल ना सही यह गुफाएं टिक जाए तो, हमें ज्ञान तो रह जाएगा की इतनी पुरानी गुफा हमारे गांव/ शहर/आसपास में थी। यह कहानी एक सिर्फ खरोसा गांव की गुफाओं की नहीं है। यह कहानी हर एक गुफा गुफाओं की है जो हमें अपने माध्यम से वास्तविक ज्ञान को परिचित करती है, कलाओं का सम्मान करना सिखाती है, सिखाती है हमें की ज्ञान के माध्यम से कैसे उच्चतम स्थान पर पहुंचा जा सकता है। कभी आपने सोचा है की छठी शताब्दी में ऐसी गुफाएं कैसी तराशी गई होगी? अगर गुफाओं की ऐसी हालत है,तो समझने में देर नहीं लगती की कलाओं का सम्मान देश में कम किया जा रहा है।
खरोसा की गुफाएं महाराष्ट्र की एक अनछुई विरासत हैं — जो हमें न केवल प्राचीन इतिहास से जोड़ती हैं, बल्कि धर्मों के बीच समन्वय, कला और आध्यात्मिकता का संदेश भी देती हैं।
कैसे पहुँचे खरोसा?
- निकटतम शहर: लातूर (लगभग 45-50 किमी दूर)
- परिवहन: निजी और सार्वजनिक वाहन से पहुँचना सबसे उपयुक्त है।
- आदर्श समय: अक्टूबर से मार्च (थंडीचा काळ), जब वातावरण ठंडा और सुहावना होता है।

बहुत अच्छी तरीके से हमे जानकारी देणे का प्रयास किया गया है।