Ken betwa Link project : एक बड़ी कोशिश, उम्मीदों से ज्यादा सवाल ?

Dhumal Aniket

Publisher - Forest Timbi Media

Ken Betwa Link Project

एक तरफ कुछ सामान्य लोग, आदिवासी लोग हैं, तो दूसरी तरफ प्रशासन और ताकत है।

“भारत में पानी का सवाल दिन-ब-दिन गंभीर होता जा रहा है… एक तरफ कुछ इलाकों में बाढ़ आती है, तो दूसरी तरफ लोग पानी की एक बूंद के लिए संघर्ष कर रहे हैं…
इस समस्या के समाधान के रूप में सरकार ने एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया है —जिसका नाम है Ken-Betwa Link Project। लेकिन… यह प्रोजेक्ट जितना बड़ा है, उतना ही बड़ा विवाद भी है।

आज हम इस प्रोजेक्ट की पूरी सच्चाई समझने वाले हैं…”

Ken-Betwa Project का आंदोलन कहां चल रहा है?

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में, Ken-Betwa Link Project और Runjh-Majhguwa बांध के कारण विस्थापित हुए आदिवासी परिवारों का यह आंदोलन है। वहीं पर पंचतत्व आंदोलन भी किया जा रहा है।

पंचतत्व आंदोलन’ क्या है?

‘चिता आंदोलन’ के साथ-साथ महिलाओं ने अब ‘पंचतत्व आंदोलन’ नाम का एक नया प्रतीकात्मक विरोध शुरू किया है। इस आंदोलन में महिलाएं कमर तक पानी में खड़ी रहीं, जबकि पुरुषों ने ‘जल सत्याग्रह’, ‘वायू सत्याग्रह’, ‘माटी सत्याग्रह’, ‘आकाश सत्याग्रह’ के बैनर लेकर पानी में खड़े रहे।

आदिवासियों की शिकायत क्या है?

आदिवासियों ने शिकायत की कि इतने दिन बीत गए, 5 हजार से अधिक लोग धूप में खड़े हैं, लेकिन एक भी अधिकारी उनसे मिलने नहीं आया। स्थानिक अधिकारियों का आदिवासियों से मिलने ना आना, यहा पर कहीं ना कहीं सरकार द्वारा इन लोगों को कम आंका जा रहा है।छतरपुर की एक आदिवासी महिला आंदोलनकारी ने कहा — “हमारे जंगल, जमीन और घर छीने जा रहे हैं, इसलिए हमें विरोध करने पर मजबूर किया जा रहा है। 10 दिन हो गए, आज 11वां दिन है, और एक भी अधिकारी नहीं आया। हमारी मांगें पूरी होने तक हम नहीं जाएंगे। अगर उन्होंने हमें नजरअंदाज किया, तो हम नक्सलवादी भी बन सकते हैं, बंदूक उठा सकते हैं। दुर्गा या काली की तरह हम भी उग्र रूप धारण कर सकते हैं… हमारे बच्चे डर में जी रहे हैं, लेकिन सरकार को परवाह नहीं कि हमारे घरों में क्या हो रहा है।

छतरपुर जिला प्रशासन ने क्या कार्रवाई की है?

छतरपुर जिला प्रशासन ने Ken-Betwa Link Project के अंतर्गत 14 प्रभावित गांवों में मुआवजे और पुनर्वास संबंधी शिकायतों की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित किए हैं। ग्रामीणों ने मुआवजा वितरण में अनियमितताओं पर आपत्ति दर्ज कराई थी। कलेक्टर ने अधिकारियों को आवेदकों के दावों और पात्रता की जांच कर 7 दिनों में रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए। प्रत्येक गांव के लिए उप-विभागीय अधिकारी, राजस्व अधिकारी और इंजीनियरों की संयुक्त टीमें मौके पर जांच के लिए तैनात की गई हैं।प्रशासन ने कहा कि सभी शिकायतों की उचित तरीके से जांच की जाएगी और रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर जरूरी कदम उठाए जाएंगे।यह आंदोलन Ken-Betwa Project के कारण जंगल, जमीन और घर खोने वाले आदिवासियों का है। उनका मुख्य आरोप है कि सरकार और अधिकारी उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज कर रहे हैं। आंदोलन और तीव्र होते देख प्रशासन ने जांच दल नियुक्त किए हैं।

Ken-Betwa Project क्या है?

Ken Betwa Project

“यह प्रोजेक्ट केन नदी और बेतवा नदी को जोड़ने का है… केन नदी मुख्यतः मध्य प्रदेश से बहती है, जबकि बेतवा नदी उत्तर प्रदेश से बहते हुए यमुना को जाकर मिलती है …सरकार का दावा है कि केन नदी में अतिरिक्त पानी है…और वह पानी बेतवा नदी में मोड़ा जाएगा…अब केन नदी में अतिरिक्त पानी कितना है इसमें लोगों के द्वारा शंका जताई जा रही है।इससे बुंदेलखंड जैसे सूखाग्रस्त इलाके को पानी मिलेगा…”यह तो सरकार के द्वारा कहा जा रहा है लेकिन क्या इतने बड़े प्रोजेक्ट की क्या यहां पर आवश्यकता है ? जहां पर पहले से ही काम होते हुए जंगलों को और ज्यादा गति से नष्ट किया जा रहा है kane betwa project के नाम पर।

प्रोजेक्ट की कुल लागत: ₹44,605 करोड़ है। इसमें केंद्र सरकार ₹36,290 करोड़ (अनुदान / grant) देगी, जबकि ₹3,027 करोड़ कर्ज / loan मिलेगा।यानी कुल केंद्र सहायता: ₹39,317 करोड़।यह प्रोजेक्ट मुख्यतः केंद्र सरकार के पैसे से होने वाला है।

भारत में नदियों को जोड़ने (River Interlinking) के कितने प्रोजेक्ट हैं?

भारत सरकार ने National River Linking Project (NRLP) नाम का एक बड़ा प्लान तैयार किया है। इसमें कुल 30 प्रस्तावित नदी-जोड़ परियोजनाएं (links) हैं। इनमें Ken-Betwa Project पहला प्रोजेक्ट है।

यह project दो भागों में विभाजित हैं:

1️⃣ हिमालयी भाग में 14 प्रोजेक्ट है जिसमे
गंगा, ब्रह्मपुत्रा और उनकी सहायक नदियों को जोड़ने का काम है।

2️⃣ पेनिनसुलर (दक्षिण/मध्य भारत) – 16 प्रोजेक्ट
गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, तापी आदि नदियों को जोड़ने का काम है।

इन प्रोजेक्ट्स से बड़े पैमाने पर पानी transfer होने की संभावना है। लेकिन इसमें एक और सबसे बड़ी बाधा यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत की नदियां सूखने का प्रमाण बढ़ता जा रहा है। गंगा आज लगभग 1300 वर्षों बाद इतनी सूखी हो गई है। ऊपर से इस तरह के प्रोजेक्ट पर्यावरण को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह जो नदिया है वह अपने शुरुआती दिनों से ही उनकी एक गति रही है उनका एक बहाव रहा है। अगर उनके बहाव में यदि मनुष्य kane – betwa project के जरिए बांध बनाता है तो इसका नतीजा काफी विनाशकारी होगा।

यहां पर 30 प्रोजेक्ट्स की बात की गई है, वह पहले ही प्रोजेक्ट काफी देरी से शुरू हुआ है। उसमें ही इतनी दिक्कतें आ गई है। इतना ज्यादा पैसा खर्च हो गया है तो आगे की प्रोजेक्ट्स को सरकार रोक भी सकती है।


सरकार की दृष्टि से Ken-Betwa Project के फायदे क्या हैं?


सरकार का कहना है कि इस प्रोजेक्ट से 10.62 लाख हेक्टेयर जमीन सिंचित
MP: 8.11 लाख हेक्टेयर
UP: 2.5 लाख हेक्टेयर

पीने का पानी
62 लाख लोगों को पानी
MP: 41 लाख
UP: 21 लाख

ऊर्जा
103 MW बिजली
27 MW सौर ऊर्जा

सरकार कहती है:

1.बुंदेलखंड क्षेत्र का विकास होगा
यह इलाका बहुत पिछड़ा और सूखाग्रस्त है।

  1. रोजगार बढ़ेगा,खेती बढ़ने से लोगों को काम मिलेगा।
  2. पलायन कम होगा,लोगों का गांव छोड़कर शहर जाना कम होगा।
  3. खेती और उद्योग बढ़ेंगे। खासकर बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए यह प्रोजेक्ट ‘game changer’ साबित हो सकता है…”

Ken-Betwa Link Project Authority (KBLPA) यह संस्था बनाई गई है, इसी के अंतर्गत सभी कार्यों की निगरानी होगी।

Ken-Betwa का विरोध क्यों हो रहा है?

“लेकिन अब बड़ा सवाल आता है — अगर प्रोजेक्ट इतना अच्छा है, तो विरोध क्यों हो रहा है? इसका जवाब भारत सरकार को अच्छी तरीके से पता है। सबसे पहला कारण है –
Panna Tiger Reserve को बड़े पैमाने पर नुकसान होना।यह प्रोजेक्ट Panna Tiger Reserve के जंगल पर सबसे बड़े पैमाने पर असर डालता है… आज हमें भारत के जंगलों की हालत पता ही है। जो थोड़े-बहुत जंगल बचे हैं, उन्हें भी सरकार अलग-अलग योजनाओं के नाम पर बर्बाद कर रही है।

Ken betwa Link project : एक बड़ी कोशिश, उम्मीदों से ज्यादा सवाल ?

Panna Tiger Reserve का बड़ा हिस्सा पानी में डूब सकता है… इससे बाघों और अन्य जानवरों का निवास स्थान नष्ट होकर जो थोड़ी-बहुत वन्यजीव प्रजातियां बची हैं, वे भी पूरी तरह विलुप्त हो जाएंगी।

लेकिन असली सवाल यह है —
क्या इस नुकसान की सही कीमत हमने या सरकार ने आंकी है? और क्या उसे आंकना संभव है?”

Panna Tiger Reserve में ~9,000 हेक्टेयर क्षेत्र पानी में डूब जाएगा। उसमें 4,141 हेक्टेयर = Panna Tiger Reserve का core area है। अनुमान है कि दाउधान जलाशय के कारण कुल 9,000 हेक्टेयर क्षेत्र जलमग्न हो जाएगा, जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व (PTR) का 4,141 हेक्टेयर कोर क्षेत्र, PTR का 1,314 हेक्टेयर बफर क्षेत्र और 10 गांवों की 2,171 हेक्टेयर ग्रामीण भूमि शामिल है। इन गांवों में लगभग 1,913 परिवार प्रभावित होंगे।

यानी सीधे बाघों के सात अन्य वन्य जीवों का “मुख्य घर” डूबेगा।भारत सरकार ने संसद में दिया आंकड़ा: ~17,101 पेड़ काटे जाएंगे। उनमें से 12,000+ पेड़ Panna Tiger Reserve के हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, वहां लाखों पेड़ों की कटाई होगी। क्योंकि जब हम किसी जंगल के एक हिस्से को नष्ट करते हैं, तो वहां सिर्फ पेड़ नहीं होते, बल्कि छोटी वनस्पतियां, झाड़ियां, छोटे जीव और वहां मौजूद एक पूरी परिसंस्था होती है। जैव विविधता होती है, वह पूरी तरह नष्ट हो जाएगी।बीसवीं सदी में जब बाघों की संख्या बहुत कम होती जा रही थी। बाघ लगभग पूरी तरह विलुप्त होने के कगार पर आ गए थे। तब भारत सरकार ने Project Tiger की शुरुआत की। इसमें पन्ना टाइगर रिजर्व ने अहम भूमिका निभाई।Project Tiger के अंतर्गत 2003 में पन्ना टाइगर रिजर्व में 40 बाघ थे। लेकिन 2009 में शिकार और खराब प्रबंधन के कारण एक भी बाघ नहीं बचा।

फिर पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या दोबारा कैसे बढ़ी?

2009 में पन्ना में बाघ पूरी तरह विलुप्त (0) हो जाने के बाद भारत सरकार ने Tiger Reintroduction Project शुरू किया। जिसमें

  1. 2009 से कान्हा, बांधवगढ़, पेंच से बाघ लाए गए। शुरुआत में कुछ मादा बाघ (T1, T2) लाई गईं। बाद में नर बाघ भी लाए गए → breeding शुरू हुई।
  2. बाघों को GPS और VHF radio collar लगाए गए। उनकी हरकतें, शिकार, व्यवहार लगातार track किया गया। वैज्ञानिक (WII) और वन विभाग लगातार अध्ययन करते रहे।
  3. जंगल में शिकार जानवर (चिंकारा, सांभर, नीलगाय) बढ़ाए गए। घास के मैदान और पानी के स्रोत सुधारे गए।
  4. कड़ी सुरक्षा, patrol team, स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाई गई। इससे शिकार रुकने में मदद मिली। इससे बाघों का survival rate ~82% हो गया।
  5. स्थानीय पारधी समुदाय और ग्रामीणों को संरक्षण में शामिल किया गया।

2024 के अंतिम महीनों में वहां की authority ने बताया कि 90 से अधिक बाघ यहां मौजूद हैं।Panna Tiger Reserve (PTR) को दुनिया के सबसे सफल वन्यजीव पुनरुद्धार प्रोजेक्ट्स में से एक माना जाता है।अब फिर एक बार Habitat कम होगा, corridor टूटेगा, breeding कम होकर prey chain टूटेगी। इसकी जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ भारत सरकार है। ना हमें अपना पॉल्यूशन कम करना है, ना हमें अच्छा Health care लोगों को देना है। ना हमें पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहना है। क्योंकि जब जंगलों पर वार किया जाता है, तब सिर्फ जंगल खत्म नहीं होते, खत्म होती है इंसानियत जो पूरे ग्रह को तबाह करने पर तुली हुई है।

दूसरा सबसे बड़ा कारण जो इस प्रोजेक्ट को विरोध कर रहा है वह यह है कि

इस प्रोजेक्ट के कारण हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ रहे हैं। उन्हें नई जगह स्थानांतरित होना पड़ेगा… लेकिन क्या उन्हें उचित सुविधाएं मिलेंगी? यह बड़ा सवाल है…

“इस प्रोजेक्ट के कारण हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ेंगे…

सरकार पुनर्वास की गारंटी देती है…
पिछले दो महीनों से धरना, रास्ता रोको, कलेक्टर कार्यालय का घेराव — इस तरह के विभिन्न तरीकों से आंदोलन चल रहा था। 5 अप्रैल को कुछ आंदोलनकारी दिल्ली कूच कर गए, जबकि स्थानीय महिलाओं ने जगह नहीं छोड़ी।बांध के क्षेत्र में 24 गांव सैकड़ों वर्षों से बसे हैं। उनमें से 8 गांव पूरी तरह पानी में डूब जाएंगे, जबकि 16 गांवों को पन्ना टाइगर रिजर्व में शामिल किया जाएगा। यह प्रोजेक्ट पन्ना टाइगर रिजर्व के core zone के 30% हिस्से पर सीधा असर डालता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त केंद्रीय समिति ने इस प्रोजेक्ट की अवधारणा पर पहले ही गंभीर आपत्तियां जताई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था: “हमारा दृष्टिकोण पर्यावरण-केंद्रित होना चाहिए, मानव-केंद्रित नहीं।”

आदिवासियों की मांगें क्या हैं?

१. गांवों को उजाड़ा न जाए
२. विस्थापन अनिवार्य हो तो 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून का पूरी तरह पालन किया जाए
३. आदिवासी संस्कृति और परंपरा को बनाए रखते हुए पुनर्वास किया जाए
४. जमीन की जगह जमीन, गांव की जगह गांव दिया जाए — नकद राशि नहीं
५. ग्रामसभा की अनुमति पारदर्शी तरीके से और नए सिरे से ली जाए

प्रशासन ने क्या किया?

प्रशासन ने लगभग 40% परिवारों के बैंक खातों में सिर्फ 12.5 लाख रुपए का पैकेज जमा किया है। जमीन की जगह जमीन देने की मांग अस्वीकार कर दी गई है।ग्रामसभा की सहमति बांध मंजूर होने के 8 साल पहले ली गई थी — उस समय ग्रामीणों को प्रोजेक्ट के बारे में कुछ भी पता नहीं था, ऐसा वे बताते हैं।प्रशासन ने प्रोजेक्ट स्थल पर धारा 144 लगाई है और बाहरी लोगों का प्रवेश बंद कर दिया है। आंदोलन के नेता अमित भटनागर को “विकास-विरोधी” बताकर बदनाम किया जा रहा है।

न्यायालय का क्या कहना है?

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने जनवरी 2024 में एक फैसले में स्पष्ट कहा: “दबाव में ली गई सहमति वैध नहीं है।” इसके अलावा वन अधिकार कानून 2006 को पूरी तरह लागू किए बिना विस्थापन नहीं किया जा सकता — और इन गांवों में आदिवासियों के वन अधिकार अभी तक मान्यता नहीं पाए हैं।

अगर पानी कम हुआ तो यह प्रोजेक्ट विफल हो सकता है…

Ken नदी में सच में ‘अतिरिक्त पानी’ है?

सरकार कहती है कि देश में पानी surplus है…
लेकिन असली वैज्ञानिक और news reports क्या कहते हैं?

भारत में बारिश सिर्फ कुछ महीनों में होती है। Climate change के कारण बारिश अनियमित हो गई है। नदियां पहले से जल्दी सूखने लगी हैं। गंगा जैसी बड़ी नदी भी इतिहास की सबसे बुरी सूखी स्थिति में है।
यह पूरा प्रोजेक्ट इस मान्यता पर टिका है कि केन नदी में ‘अतिरिक्त पानी’ है…
लेकिन यह डेटा ठीक कितने साल पुराना है?
climate change को ध्यान में रखकर उसे अपडेट किया गया है?अगर भविष्य में पानी कम हो गया, तो क्या यह प्रोजेक्ट गलत आधार पर खड़ा नहीं होगा?”

Ken-Betwa Project में सरकार पैसों का सही उपयोग कर रही है?

इस प्रोजेक्ट पर 44,605 करोड़ रुपए खर्च होने वाले हैं…इतने पैसों में छोटे और प्रभावी उपाय किए जा सकते थे…जैसे — बारिश का पानी संग्रहित करना (Rainwater harvesting), छोटे बांध और तालाब, पानी का स्थानीय प्रबंधन, खेती के तरीकों में बदलाव।

क्योंकि भारत में अभी भी ज्यादातर किसान ड्रिप इरीगेशन का उपयोग नहीं करते। आप महाराष्ट्र के मराठवाडा में बीड, परभणी, संभाजी नगर जैसे जिलों में देख सकते हैं कि यह इलाका सूखाग्रस्त होने के बावजूद यहां पर गन्ने की खेती को बड़े पैमाने पर लगाया जाता है और वह भी Drip irrigation का उपयोग बहुत न्युन स्तर पर है। ऐसे में पानी का नुकसान ज्यादा होता है। तो क्या इन इलाकों में भी kane betwa project जैसे योजनाएं सरकार कर सकती है ?क्या यह खर्च सच में सही दिशा में जा रहा है?इन्हीं पैसों में छोटे, स्थानीय उपाय ज्यादा प्रभावी साबित होते क्या?बड़े प्रोजेक्ट इसलिए चुने जाते हैं क्योंकि वे दिखने में बड़े और प्रभावशाली लगते हैं?”

Ken–Betwa Project पर Forest Timbi के सरकार से कुछ सवाल है।

केन नदी में “ज्यादा पानी” है — यह ठीक किस डेटा के आधार पर है?यह डेटा कितने साल पुराना है?
Climate change के बाद उसे अपडेट किया गया है?
अगर भविष्य में पानी कम हो गया तो यह प्रोजेक्ट विफल नहीं होगा?

Panna Tiger Reserve का जंगल डूबने वाला है
इसकी भरपाई ठीक कैसे होगी?बाघों और अन्य जानवरों का habitat नष्ट होने पर क्या उनके लिए सच में सुरक्षित विकल्प है?पर्यावरणीय नुकसान की long-term कीमत आंकी गई है?

₹40,605 करोड़ खर्च — इन्हीं पैसों में local solutions ज्यादा कारगर नहीं होते?
इस प्रोजेक्ट का actual return (फायदा vs खर्च) कैसे मापा गया है?

मिलने वाला पानी सभी किसानों तक पहुंचेगा इसकी गारंटी क्या है?
बड़े प्रोजेक्ट्स में पानी अक्सर बर्बाद होता है — efficiency कैसे बनाए रखेंगे?

Rainwater harvesting, local water management — ये उपाय पहले पूरी तरह क्यों नहीं अपनाए गए? क्या छोटे उपायों से समस्या सुलझ सकती है? अगर हां, तो बड़ा प्रोजेक्ट क्यों?

मुझे पता है कि इन सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे क्योंकि जहां पर हमें बनानें वाले के प्रति यदि हमारा स्वार्थ का रिश्ता होता है तो हमें सच नहीं दिखाई देता। जब सच्चाई दिखाई देगी तब एक पेड़ नहीं कटेगा ना एक जीव विलुप्ति की कगार पर नहीं खड़ा होगा। यह काम उस अहंकार का है जो खुद की तबाही सामने होते हुए भी मुस्कुराता है।

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