Heat and health| गर्मी में इंसानी मस्तिष्क धीमा पड़ता है: क्या अब सोचने की शक्ति भी छिन जाएगी?

Dhumal Aniket

Updated on:

Publisher - Forest Timbi Media

Heat and health


दिमाग की गर्मी में हार?

Heat and health : गर्मी का असर सिर्फ शरीर पर नहीं पड़ता — दिमाग भी उसकी तपिश से झुलसने लगता है।
जब तापमान 40 डिग्री के पार जाता है, तब सिर्फ पसीना ही नहीं निकलता, बल्कि सोचने, समझने और निर्णय लेने की शक्ति भी कमजोर हो जाती है।

यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक शोधों से प्रमाणित सच्चाई है।


क्या कहती है विज्ञान की भाषा?

  1. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का अध्ययन (2018):
    • अधिक तापमान वाले इलाकों में रहने वाले छात्रों का रिएक्शन टाइम 13% धीमा पाया गया।
    • उनका ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी 10% कम हो गई।
  2. थर्मल स्ट्रेस और ब्रेन फंक्शन:
    • शरीर जब गर्म होता है, तो दिमाग का हाइपोथैलेमस भाग तापमान को नियंत्रित करने में व्यस्त हो जाता है।
    • इससे तर्क, स्मृति और फोकस करने की क्षमता प्रभावित होती है।
  3. नींद पर असर:
    • गर्मी में सही नींद नहीं होती, जिससे मस्तिष्क की थकावट और अधिक बढ़ जाती है।
    • यह मानसिक स्वास्थ्य और कार्यक्षमता को सीधा प्रभावित करता है।

गर्मी से कैसे धीमा पड़ता है दिमाग?

  1. शरीर की ऊर्जा “ठंडा” रखने में खर्च होती है:
    • जब शरीर पसीना निकालता है, तो दिमाग को ऊर्जा कम मिलती है।
    • निर्णय लेने में समय ज़्यादा लगता है, और गलतियां भी बढ़ जाती हैं।
  2. तंत्रिका संचार धीमा हो जाता है:
    • न्यूरॉन्स के बीच सिग्नल भेजने की गति धीमी हो जाती है।
    • सोचने की प्रक्रिया धीमी और थकी हुई हो जाती है।
  3. भावनात्मक नियंत्रण भी गड़बड़ाता है:
    • चिड़चिड़ापन, गुस्सा और घबराहट गर्मी में अधिक देखने को मिलते हैं।
    • इसका असर रिश्तों और काम दोनों पर पड़ता है।

किसे होता है सबसे ज़्यादा असर?

Heat and health
  • बच्चे और छात्र:
    पढ़ाई में ध्यान नहीं लगता, याददाश्त कमजोर पड़ती है।
  • कामकाजी वर्ग:
    गलत निर्णय, थकावट और काम में गिरावट।
  • बुज़ुर्ग:
    मानसिक संतुलन में बदलाव, भ्रम जैसी स्थिति।
  • गृहिणियां और रसोई में काम करने वाले:
    रसोई में पहले से ही तापमान अधिक होता है, जिससे मानसिक तनाव और भी बढ़ता है।

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बच्चों का IQ भी गर्मी में घट सकता है ?

5–10 वर्ष की उम्र में बच्चों का मस्तिष्क विकसित हो रहा होता है।
गर्मी में उनका ध्यान जल्दी भटकता है, थकान ज़्यादा होती है और पढ़ाई पर असर पड़ता है।
अगर लगातार अत्यधिक गर्मी में रहना पड़े तो उनकी आई.क्यू. ग्रोथ भी धीमी हो सकती है।

इसके दूरगामी परिणाम क्या हो सकते हैं?

  1. उत्पादकता में गिरावट:
    • कर्मचारी, किसान, छात्र – सभी की कार्यक्षमता पर असर।
  2. मानसिक स्वास्थ्य पर खतरा:
    • डिप्रेशन, एंग्जायटी और ब्रेन फॉग (दिमागी धुंध) जैसी समस्याएं।
  3. रोज़मर्रा के फैसलों में चूक:
    • दुर्घटनाएं, वित्तीय नुकसान, सामाजिक संघर्ष।

समाधान क्या है?

  1. प्राकृतिक शीतलता अपनाएं:
    • मिट्टी के घर, टपरी या पेड़ों की छांव में समय बिताना।
    • नींबू पानी, जलजीरा जैसे ठंडे पेय लेना।
  2. घर और दिमाग को ठंडा रखने के उपाय:
    • छत पर घास या वाइट पेंट करें।
    • ब्रेन कूलिंग योगा: शीतली और शीतकारी प्राणायाम।
    • दोपहर में 15-20 मिनट की पॉवर नैप।
  3. संगीत और ध्यान:
    • शांत संगीत और मेडिटेशन दिमाग को थकान से राहत देते हैं।
    • यह प्राकृतिक “मस्तिष्क शीतलता” का काम करता है।

चेतावनी है, मौसम की नहीं, मानसिकता की!

अगर हम यह सोचते हैं कि गर्मी बस एक मौसम है, तो हम भूल कर रहे हैं।
यह सोच को खत्म करने वाला संकट बन चुका है। अगर मस्तिष्क ही धीरे चलने लगे, तो हम किसी भी क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ सकते।

How does extreme heat affect your body? - Carolyn Beans

अब वक्त है सिर्फ शरीर नहीं, दिमाग को भी बचाने का

हर पेड़, हर ठंडी छाया, हर शांत क्षण अब मस्तिष्क के लिए भी अमृत बन चुका है।


असल में समस्या कहां है ?

जैसे-जैसे समय बिता जा रहा है वैसे-वैसे नई-नई चुनौतियां इंसानों के सामने आ रही है और वह चुनौतियां सिर्फ और सिर्फ इंसानों के निर्माण के ही वजह से आ रही है। आज जिस स्तर पर तापमान है उतना कभी भी नहीं था। इसकी जिम्मेदार हम ही है। लेकिन हम समझ रहे हैं कि इसका परिणाम हमें भुगतना नहीं पड़ेगा। प्रकृति में सब समान है। प्रकृति हर जीव को जीने का अधिकार देती है। यदि कोई एक प्रजाति अपने बुद्धि का इस्तेमाल करके इतने उच्च स्तर पर स्वयं का विकास करती है और किसी अन्य प्रजाति को नष्ट करने पर उठी होती है, तो तब प्रकृति का चक्र फिसल जाता है। यदि स्वयं के विकास के साथ-साथ किसी अन्य प्रजातियों को भी हमने सम्मान से रहने दिया होता और साथ ही साथ प्रकृति को भी संभाला होता, तो आज यह दिन नहीं आता। तापमान इतना बढ़ चुका है कि कई तरह की बीमारियों को आमंत्रण मिल चुका है।

पर्यावरण को बचाने के लिए सरकार निधि का प्रबंध नहीं करती सरकारों के और से कहा जाता है कि अब हम ऐसी स्थिति में है कि हमें अपने विकास के मार्ग पर ही ऐसी खर्च करने के लिए पैसे हैं। तो हम पर्यावरण के लिए विशेष निधि का प्रबंध नहीं कर सकते। लेकिन जिन कामों को करने के लिए उन्होंने चुना है उन्हें कामों से ही तो पर्यावरण जल रहा है। जैसे-जैसे हम अगले साल में जा रहे हैं। वैसे वैसे वह साल पिछले साल के मुकाबला ज्यादा तापमान दर्ज कर रहा है।

इंसानों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। आने वाले समय में खाने के लिए भी इंसानों को तड़पना होगा। तो सोचिए उन जानवरों का पशुओं का क्या हाल होगा। बढ़ते गर्मी के कारण, ज्यादा बारिश के कारण खेतों में फसल की उत्पादकता कम होने वाली है। वैसे भी आज के समय में 80 करोड़ लोग बिना खाने सो जाते हैं। भारत एक ऐसा देश है जहां पर मिट्टी उपजाऊ है। अगर भारत की भी मिट्टी में सबसे ज्यादा रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल हो रहा है तो यहां की भी मिट्टी में मृत हो जाएगी। आज हम इस चीज की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि खाना भी सेहत के लिए उतना ही जरूरतमंद है जितना की सूरज से मिलने वाली रोशनी। आज के समय में हम इतने आगे जा चुके हैं कि, हम सब चीजों में आगे गये हैं। खाने के मामले में भी। जो कि हमें नहीं जाना चाहिए था। खान के हस्बैंड तभी होता है जब उसने उर्वरकों का इस्तेमाल न के बराबर किया हो। इसीलिए तो हम कह रहे हैं की, चेतावनी है मौसम की नहीं, मानसिकता की!

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