Microplastics in human body: वो अदृश्य ज़हर जो आपकी थाली से खून तक पहुंच चुका है

Dhumal Aniket

Updated on:

Publisher - Forest Timbi Media

Microplastics in human body

Microplastics in human body: प्लास्टिक का आविष्कार मानव जीवन के लिए एक बड़ी क्रांति था। इसका उपयोग हर क्षेत्र में होने लगा — खाद्य पैकिंग, दवाइयां, कपड़े, वाहन, खिलौने, आदि। लेकिन समय के साथ यह वरदान अब एक गंभीर संकट बन चुका है।

अब प्लास्टिक सिर्फ हमारे आसपास नहीं, बल्कि हमारी थाली से होते हुए खून और दिमाग तक पहुंच चुका है। इसे कहा जाता है — माइक्रोप्लास्टिक


माइक्रोप्लास्टिक क्या होता है?

माइक्रोप्लास्टिक ऐसे प्लास्टिक कण होते हैं जो 5 मिमी से भी छोटे होते हैं — यानी चावल के दाने से भी छोटे। सबसे पहले 2004 में ब्रिटेन के शोधकर्ता Dr. Richard Thompson ने समुद्र तट की रेत में इन सूक्ष्म रंग-बिरंगे प्लास्टिक कणों की पहचान की, जो आम आंख से दिखाई भी नहीं देते।

“समुद्र में फेंका गया प्लास्टिक गायब नहीं हुआ है —
वह टूटकर छोटे-छोटे कणों में बदल गया है और जीवों, रेत और जल में मिल गया है।”


माइक्रोप्लास्टिक शरीर में कैसे प्रवेश करता है?

Microplastics in human body

हम रोजाना खाने, पीने और हवा के जरिए माइक्रोप्लास्टिक कणों को निगल रहे हैं। WHO की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 93% बोतलबंद पानी में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है।

“Microplastic in human body” इस अध्ययन के मुताबिक:

  • औसत अमेरिकी हर साल लगभग 74,000 से 121,000 माइक्रोप्लास्टिक कण निगलता है।
  • जो लोग सिर्फ बोतलबंद पानी पीते हैं, वे 90,000 कण ज्यादा निगलते हैं।
  • वहीं प्लास्टिक की पाइपलाइन से पानी पीने वालों में भी 4000 कण सालाना शरीर में पहुंचते हैं।

खाने से कैसे मिलता है प्लास्टिक?

खाद्य पैकिंग में प्लास्टिक का उपयोग सबसे ज़्यादा होता है —
कनाडा में लगभग 38% और भारत में 35% प्लास्टिक सिर्फ पैकेजिंग के लिए उपयोग होता है।

जब गरम खाना प्लास्टिक के डब्बों या कंटेनर में रखा जाता है (जैसे झुणका-भाकरी, भात, सांभर),
तो गर्मी के कारण सूक्ष्म प्लास्टिक कण खाने में मिल जाते हैं।


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शरीर में प्लास्टिक का जमाव कैसे होता है?

नवीन शोध के अनुसार,पहली बार microplastics in human body वैज्ञानिकों ने मरे हुए लोगों के मस्तिष्क, लिवर और किडनी में माइक्रोप्लास्टिक के कण खोजे।
विशेषज्ञों ने FTIR, GC–MS, SEM, EDX जैसी वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग करके यह साबित किया कि यह प्लास्टिक कण blood-brain barrier को पार करके मस्तिष्क तक जा चुके हैं।

“ब्लड-ब्रेन बैरियर” शरीर और मस्तिष्क के बीच एक दीवार की तरह काम करता है, जो
टॉक्सिन, वायरस, और हानिकारक पदार्थों को मस्तिष्क तक पहुंचने से रोकता है।

लेकिन प्लास्टिक के सूक्ष्म कण इसे भी पार कर लेते हैं।
डिमेंशिया से पीड़ित रोगियों के मस्तिष्क में ये कण अधिक मात्रा में पाए गए,
जिससे यह आशंका बढ़ती है कि प्लास्टिक का संबंध मस्तिष्क रोगों से हो सकता है।


1. क्या माइक्रोप्लास्टिक शरीर से बाहर निकलता है?

कुछ मात्रा में यह मल या मूत्र से बाहर निकलता है, लेकिन बहुत से कण ऊतकों में जमा हो जाते हैं, जो वर्षों तक रह सकते हैं।

2. क्या नवजात बच्चों में भी यह पाया गया है?

हां। नवजात शिशुओं की विष्ठा (मेकोनियम) में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है।इसका मतलब यह गर्भावस्था के दौरान भी शिशु तक पहुंच सकता है।

“प्लास्टिक-फ्री” खाना क्या सचमुच प्लास्टिक मुक्त होता है?

पूरी तरह नहीं, लेकिन स्टील, कांच के बर्तनों और फ़िल्टर पानी का उपयोग करने से जोखिम बहुत कम किया जा सकता है।

क्या सिर्फ बाहर निकलने से ही यह खतरा है?

नहीं। घर की धूल, पर्दे, सिंथेटिक कपड़े, प्लास्टिक फर्नीचर — सभी से माइक्रोप्लास्टिक हवा में फैलता है।

5.क्या हम इसे पूरी तरह रोक सकते हैं?

अभी नहीं, लेकिन जागरूकता और जीवनशैली में बदलाव से हम इसका प्रभाव बहुत हद तक कम कर सकते हैं। क्योंकि करोड़ तन में हर दिन प्लास्टिक तैयार होता है।


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